दूसरी पत्नी भी भरण-पोषण की हकदार :हाईकोर्ट
प्रयागराज, अमृत विचार। लिव-इन में रह रही महिला द्वारा भरण-पोषण की मांग के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण आदेश देते हुए कहा कि निश्चित रूप से लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिला भरण-पोषण की हकदार है। हालांकि कानूनी रूप से विवाहित हिंदू पुरुष या पहले से विवाहित हिंदू और मुस्लिम महिलाएं किसी अन्य के साथ लिव-इन में रहते हुए भरण-पोषण का दावा नहीं कर सकती हैं, लेकिन अपनी वैवाहिक स्थिति छुपाकर दूसरा विवाह करने वाले पुरुष से उसकी लिव-इन पार्टनर भरण-पोषण का दावा कर सकती है। उक्त आदेश न्यायमूर्ति उमेश चंद्र शर्मा ने श्रीमती सोनिया श्रीवास्तव व अन्य की याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया।
दरअसल याची ने सीआरपीसी की धारा 125(6) के तहत परिवार न्यायालय, कानपुर नगर द्वारा पारित आदेश को रद्द करने तथा अंतरिम रखरखाव के लिए धनराशि भुगतान हेतु उचित दिशा निर्देशों की मांग करते हुए हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी। गौरतलब है कि विपक्षी रमेश चंद्र शर्मा खुद को विधुर बता कर याची के साथ लिव-इन में रहा और बाद में दोनों ने विवाह कर लिया, जिसके बाद उन्हें एक बेटी पैदा हुई। इसके बाद विपक्षी ने याची को खुद ही अपनी पहली पत्नी के बारे में बताया, जिसके परिणामस्वरूप याची ने सितंबर 2007 में विपक्षी के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई और परिवार न्यायालय के समक्ष दस्तावेजों के आधार पर सीआरपीसी की धारा 125 और 125(6) के तहत भरण-पोषण की मांग की। अंतरिम रखरखाव के लिए याची ने प्रतिमाह 30,000 रुपए की मांग की, लेकिन प्रस्तुत दस्तावेजों पर विचार किए बिना परिवार न्यायालय ने उसकी अर्जी खारिज कर दी।
विपक्षी के अधिवक्ता ने उच्च न्यायालय के समक्ष यह तर्क दिया कि विपक्षी कमजोर वर्ग का है। अतः वह भरण-पोषण की राशि देने में असमर्थ है, साथ ही विपक्षी ने याची से विवाह होने की बात से इनकार किया है और वह पैदा हुई बेटी का जैविक पिता भी नहीं है। मौजूदा याचिका पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 20(3) के तहत ऐसे मामलों के निस्तारण हेतु डीएनए का सैंपल लेना कोई अपराध नहीं है। हालांकि जब अदालत ने उसे डीएनए परीक्षण कराने के लिए आवश्यक शुल्क का भुगतान करने का आदेश दिया तो वह आगे नहीं आया। इसके अलावा कानपुर नगर निगम द्वारा निर्गत बालिका का जन्म प्रमाण पत्र और दंपति की पर्यटन स्थलों पर खींची गई फोटो आदि ऐसे प्रमाण हैं, जिनसे सिद्ध होता है कि विपक्षी ने याची के साथ विवाह किया था। इसके अलावा कोर्ट ने यह भी नोट किया कि सामान्यतः एक महिला ऐसा दावा नहीं करेगी, जिससे उसका चरित्र, करियर और सम्मान हमेशा के लिए कम हो जाए।
अंत में कोर्ट ने विपक्षी को डीएनए नमूना देने व उसके लिए आवश्यक शुल्क जमा करने के लिए एक महीने का अतिरिक्त समय प्रदान करते हुए परिवार न्यायालय को यह निर्देश दिया कि अगर उपरोक्त निर्धारित अवधि के भीतर विपक्षी द्वारा ऐसा नहीं किया जाता है तो परिवार न्यायालय विपक्षी के खिलाफ प्रतिकूल निष्कर्ष निकालने के लिए स्वतंत्र होगा।
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