चुनाव प्रक्रिया में हस्तक्षेप का अधिकार नहीं : हाईकोर्ट
प्रयागराज, अमृत विचार। चुनाव प्रतीक आवंटित करने के संबंध में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा कि चुनाव के मामलों में न्यायालय द्वारा हस्तक्षेप केवल चुनाव सम्पन्न कराने में सहायक के रूप में हो सकता है। पहले से चल रही चुनाव प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने का अधिकार न्यायालय को नहीं है। मौजूदा मामले में पार्टी के प्रतीक चिन्ह के आवंटन से संबंधित तथ्यों की रिटर्निंग ऑफिसर द्वारा गलत जांच की गई। अतः चुनाव आयोग द्वारा उक्त मामले से संबंधित स्थापित दिशानिर्देशों के आधार पर रिटर्निंग ऑफिसर को सभी तथ्यों की फिर से जांच कर उचित निष्कर्ष निकालना होगा। उक्त आदेश न्यायमूर्ति अश्विनी कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की खंडपीठ ने महापौर पद के लिए कांग्रेस प्रत्याशी राजकुमार रावत की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया।
दरअसल याची राजकुमार रावत रिटर्निंग ऑफिसर के 18 अप्रैल 2023 के आदेश से व्यथित हैं, जिसमें मथुरा-वृंदावन क्षेत्र से मेयर पद के प्रत्याशी हेतु भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के चुनाव प्रतीक को याची के बदले विपक्षी को आवंटित कर दिया गया है। मालूम हो कि कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष ने रिटर्निंग ऑफिसर को पहले ही सूचित कर दिया था कि पार्टी का प्रतीक चिन्ह याची को आवंटित किया गया है। फिर भी रिटर्निंग ऑफिसर ने आवंटन से संबंधित तथ्यों की गलत जांच की।
याचिका में वर्णित तथ्यों के अनुसार मथुरा- वृंदावन क्षेत्र से चुनाव लड़ने के लिए विपक्षी ने दिनांक 16 अप्रैल 2023 को सुबह 11 बजे नामांकन पत्र के दो सेट जमा किए, जिसमें फार्म 7ए पार्टी चिन्ह के आवंटन से संबंधित प्रपत्र जमा नहीं किया। याची ने इसी दिन दोपहर 12 बजे नामांकन पत्र के साथ प्रारूप 7ए को जमा कर दिया। विपक्षी ने दिनांक 17 अप्रैल को नए सिरे से नामांकन पत्र की दो सेटों के साथ पार्टी का फार्म संलग्न किया और कांग्रेस के प्रतीक के आवंटन का दावा किया।
राज्य निर्वाचन आयोग की ओर से प्रस्तुत अधिवक्ता ने कहा कि ऐसी स्थिति में रिटर्निंग अधिकारी के लिए राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा जारी मार्गदर्शक सिद्धांत के खंड 9 में दिए गए नियमों को उचित माना है। खंड 9 के अनुसार अगर किसी राजनीतिक दल के राष्ट्रीय/ प्रदेश अध्यक्ष या सचिव द्वारा उस राजनीतिक दल की ओर से प्रारूप 7ए पर एक उम्मीदवार को प्राधिकृत किया गया है और किसी कारण उस उम्मीदवार के प्राधिकार पत्र को निरस्त करके दूसरे उम्मीदवार के पक्ष में पुनः प्रारूप 7ए निर्गत कर दिया जाता है तो ऐसे मामलों में रिटर्निंग अधिकारी बाद में प्राधिकृत उम्मीदवार को उस राजनीतिक दल द्वारा खड़ा उम्मीदवार मानते हैं, लेकिन अगर दल के अध्यक्ष या पदाधिकारी द्वारा पहले उम्मीदवार को निर्गत प्रारूप को निरस्त किए बिना किसी दूसरे उम्मीदवार को पुनः प्रारूप 7ए निर्गत कर दिया जाता है और ऐसा नामांकन निर्धारित अंतिम तिथि व समय के पूर्व रिटर्निंग ऑफिसर को उपलब्ध करा दिया जाता है तो ऐसे मामलों में जिस उम्मीदवार द्वारा सबसे पहले अपना नामांकन पत्र रिटर्निंग अधिकारी को उपलब्ध कराया गया है, वहीं उम्मीदवार उस दल द्वारा खड़ा उम्मीदवार माना जाएगा। बाकी सभी उम्मीदवार निर्दलीय प्रत्याशी माने जाएंगे। उक्त नियमों के आलोक में रिटर्निंग अधिकारी ने यह तथ्य प्रस्तुत किया कि विपक्षी द्वारा नामांकन पत्र याची से पहले दाखिल किया गया था।
याची के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि हालांकि नामांकन पत्र विपक्षी द्वारा पहले जमा किया गया था, लेकिन उसके साथ प्रारूप 7ए जमा नहीं था, इसलिए उनकी उम्मीदवारी निर्दलीय मानी जाएगी। इसके विपरीत याची ने अंतिम तिथि और समय से पहले अपना नामांकन प्रारूप के साथ रिटर्निंग अधिकारी के पास जमा कर दिया था। अंत में सभी तथ्यों पर विचार करते हुए कोर्ट ने पाया कि राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा रिटर्निंग ऑफिसर को उपरोक्त तथ्यों से अवगत कराया जाए, जिससे याचिका में उठाए गए सवालों की जांच की जा सके और उम्मीदवार को पार्टी चिन्ह के आवंटन से संबंधित एक उचित निर्णय लिया जा सके।
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