Gyanvapi Case : मुस्लिम पक्ष की याचिका हाईकोर्ट ने की खारिज, नियमित पूजा की मांग पर होगी सुनवाई
प्रयागराज, अमृत विचार। वाराणसी के ज्ञानवापी मामले से जुड़े एक विवाद में आज यानी बुधवार को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला दिया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस फैसले से मुस्लिम पक्ष को झटका लगा है। श्रृंगार गौरी की नियमित पूजा की मांग वाली हिन्दू पक्ष की याचिका पर सुनवाई अब जिला कोर्ट वाराणसी में होगी। इस मामले की अगली सुनवाई जिला कोर्ट में सात जुलाई को होगी।
दरअसल, हिन्दू पक्ष की याचिका को लेकर इंतजामिया मस्जिद कमेटी ने आपत्ति जताते हुये अर्जी दाखिल की थी। जिसको हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया है। वहीं श्रृंगार गौरी की नियमित पूजा की मांग को लेकर हिंदू पक्ष की तरफ से दायर याचिका की सुनवाई जिला कोर्ट करेगा। यह फैसला न्यायाधीश जेजे मुनीर की सिंगल बेंच ने सुनाया है।
तीन महीने की लंबी बहस के बाद कोर्ट ने 23 दिसंबर 2022 में फैसला सुरक्षित कर लिया था, जिसे बुधवार को जारी किया गया है। मालूम हो कि राखी सिंह व नौ अन्य महिलाओं ने काशी विश्वनाथ मंदिर के बगल में स्थित मस्जिद परिसर की बाहरी दीवार पर मां श्रृंगार गौरी की पूजा करने के अधिकार की मांग करते वाराणसी कोर्ट के समक्ष एक मुकदमा दायर किया था। वादी ने दावा किया है कि वर्तमान मस्जिद परिसर कभी एक हिंदू मंदिर था और इसे मुगल शासक औरंगजेब द्वारा ध्वस्त कर दिया गया था और उसके बाद वर्तमान मस्जिद का ढांचा वहां बनाया गया है।
सिविल वाद का विरोध करते हुए मुस्लिम पक्ष का तर्क था कि उपासना स्थल अधिनियम से नियमित पूजा प्रतिबंधित है, क्योंकि पूजा द्वारा स्थल की धार्मिक प्रकृति से छेड़छाड़ होगी, जो कानूनन अपराध है, इसलिए यहां नियमित पूजा की अनुमति नहीं मिलनी चाहिए। मर्यादा कानून (लिमिटेशन एक्ट) के आधार पर सिविल वाद की मियाद को बाधित करार देते हुए कहा कि चालाकी से पूजा के अधिकार की मांग में दाखिल सिविल वाद से विपक्षी के अधिकारों में हस्तक्षेप करने की कोशिश की गई है। जिससे 1991 के कानून का उल्लघंन होगा, इसलिए जिला अदालत में श्रृंगार गौरी की नियमित पूजा के लिए दाखिल वाद सुनवाई योग्य नहीं है।
हालांकि जिला अदालत ने अंजुमन इंतजामिया मसाजिद कमेटी, वाराणसी की अर्जी खारिज कर दी, जिसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है। मंदिर पक्ष की तरफ से अधिवक्ता ने तर्क देते हुए कहा कि पौराणिक साक्ष्यों एवं 15 अगस्त 1947 के पहले से श्रृंगार गौरी, हनुमान व कृति वासेश्वर की पूजा होती आ रही है, इसलिए इस मामले में पूजा का स्थान अधिनियम,1991 लागू नहीं होगा। इनका कहना था कि मंदिर में मूर्ति की प्राणप्रतिष्ठा होने के बाद उस जमीन का स्वामित्व मूर्ति में निहित हो जाता है। हिन्दू विधि में मंदिर ध्वस्त होने के बाद भी अप्रत्यक्ष मूर्ति का अस्तित्व बना रहता है।
उन्होंने कहा कि औरंगजेब ने स्वयं भू विश्वेश्वर नाथ मंदिर तोड़ा। इस्लामिक कानून के तहत इसे मस्जिद नहीं माना जा सकता, क्योंकि विवादित स्थल पर नमाज कबूल नहीं होती। बहस के दौरान मंदिर पक्ष के अधिवक्ता ने 1937 के दीन मोहम्मद केस का हवाला देते हुए कहा कि इस केस में केवल वादी को नमाज पढ़ने की अनुमति दी गई है, न कि पूरे मुस्लिम समाज को नमाज पढ़ने की इजाजत मिली है। उन्होंने मुख्य रुप से कहा कि जहां आज तीन गुंबद है, वहीं पर श्रृंगार गौरी, हनुमान व कृतिवास मंदिर था। एक नक्शा भी पेश कर बताया गया कि किसी इस्लामिक इतिहासकार ने ज्ञानवापी मस्जिद का जिक्र नहीं किया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि आलमगीर मस्जिद विवादित स्थल से तीन किलोमीटर दूरी पर स्थित है। उस काल में कई मंदिरों को तोड़कर मस्जिदें बनाई गई।
अधिवक्ता ने आगे कहा कि काशी विश्वनाथ मंदिर एक्ट पहले का है। समवर्ती सूची के कारण प्लेसेस आफ वर्शिप एक्ट भी इस मामले में प्रभावी होगा। इस कानून के तहत ज्ञानवापी परिसर की भूमि विश्वनाथ मंदिर की है। मस्जिद का किसी भूमि पर स्वामित्व नहीं है। मंदिर की संपत्ति या हिंदू- मुस्लिम विवाद वक्फ अधिकरण को सुनने का अधिकार नहीं है। वह मुस्लिमों के बीच का विवाद ही सुन सकता है।
हिंदू पक्ष के अधिवक्ता ने यह भी तर्क दिया कि स्कंद पुराण के आधार पर कहा जा सकता है कि पंचकोसी परिक्रमा मार्ग में आने वाले मंदिरों का उल्लेख किया गया है। उनमें से कुछ पर मस्जिद बनी हुई है। ज्ञानवापी कूप में स्नान कर श्रृंगार गौरी के पूजन का विधान है। विवादित ढांचे की तस्वीर पेश कर कहा कि साफ दिखाई दे रहा है कि मंदिर तोड़कर मस्जिद का आकार दिया गया है। परिक्रमा मार्ग में 11 मंदिरों का उल्लेख है।सबकी अलग पूजा पद्धति दी गई है। अंत में दोनों पक्षों के तर्कों को सुनने के बाद याचिका खारिज कर दी गई।
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