गायकों की बदहाल आर्थिक हालत से लुप्तप्राय हो रही है कजरी

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Edited By Amrit Vichar
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प्रयागराज। कजरी गायन शैली को राष्ट्रीय स्तर का दर्जा दिलाने में अहम भूमिका निभाने वाले उप-शास्त्रीय और शास्त्रीय गायक और गायिकाओं की बदहाल आर्थिक स्थिति का असर लोकगीतों की ‘रानी कजरी’ पर भी पड़ा है और यह गायन शैली लुप्तप्राय होती जा रही है। कजरी भले ही पावस गीत के रूप में गायी जाती है लेकिन इसने लोक जीवन के विभिन्न पक्षों में सामाजिक चेतना का अलख जगाने का भी कार्य किया है।

स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान कजरी ने लोक चेतना को बखूबी अभिव्यक्त किया। कजरी गायन के लुप्तप्राय होने का कोई एक कारण नहीं हैं। आर्थिक तंगी,सामाजिक प्रोत्साहन,पाश्चात्य शैली, कलाकार और श्रोता तथा लेखन के अभाव जैसे तमाम कारणों ने इस अनूठी कला को प्रभावित किया हैं। पहले गायकों को राजाश्रय प्राप्त था। वहां कलाकारों को एक निर्धारित राशि के अलावा गायन के लिए आर्थिक प्रोत्साहन दिया जाता था। 

आज इस कला के कद्रदान ढूंढ़ने से नहीं मिलते है। नयी पीढ़ी इस विधा को रूढिवादिता की संज्ञा देकर इसका तिरस्कार कर रही है, वहीं पाश्चात्य शैली की चादर ओढ़कर अपनी संस्कृति और संस्कार से दूर होती जा रही है। कला के क्षेत्र में राष्ट्रपति से ‘पद्मश्री’ सम्मान से सम्मानित एवं राज्यपाल आनंदी बेन के हाथों संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार प्राप्त अजिता श्रीवास्तव ने बताया कि सरकार द्वारा लगातार प्रोत्साहन देने के बावजूद भी नयी पीढ़ी के लोगों में कजरी गायन विधा सीखने की ललक क्षीण है। उनमें किसी प्रकार का उत्साह नजर नहीं आ रहा है।

 सरकार इसके प्रोत्साहन के लिए समय समय पर नामचीन कलाकारों को मंच प्रदानकर कार्यक्रम आयोजित कराती रहती है। इसको बचाने का काम किया जा रहा है ताकि लोककला की सनातन परंपरा अक्षुण्य रह सके। नामचीन कजरी गायिका अजीता श्रीवास्तव ने बताया कि किसी भी देश की पहचान वहां की संस्कृति, साहित्य एवं कला से ही होती है। लोक कलाओं को आगे बढ़ाने के लिए कलाकारों का संरक्षण जरुरी है। कजरी लोकगीत के पुराने कलाकारों को आर्थिक सुदृढ़ता की व्यवस्था कर उन्हें फिर से इसकी मुख्यधारा से जोड़ा जा सकता है। 

सरकार द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में क्षेत्रीय गायकों का अभाव होता है। इस प्रकार के कार्यक्रमों में क्षेत्रीय गायकों को यदि प्रोत्साहित किया जाए और उनकी जर्जर आर्थिक तानेबाने को सुदृढ़ता प्रदान करने की तरफ सरकार ध्यान दे तो पुराने कलाकरों को फिर से इसकी मुख्यधारा की तरफ मोड़ा जा सकता है। इसके अलावा श्रोताओं के मनपसंद ऐसे कुछ प्रयोग भी किये जाने होंगे जिससे उनका भी झुकाव इस समृद्ध विधा की ओर हो सके। 

उन्होंने कहा कि परिवार चलाने के लिए जर्जर होते अर्थिक तानेबाने के कारण कलाकारों को रोजीरोटी के लिए अन्यत्र राह तलाशनी पड़ी। आज भी इनके लिए छोटे और बड़े मंचों पर अवसर सुनिश्चित किया जाए तो इतिहास के पन्नों में दर्ज होने से बचाया जा सकता है। आज गायकों के साथ श्रोताओं का भी अभाव हो गया है। श्रोता नहीं हाेने से गायकों का मनोबल स्वत: ही टूट जाता है। पहले गाडियों और बाजारों में दुकानों पर सावन में कजरी के कैसेट बजते थे जो अपनी मीठी रस भरी लयबद्ध सुर से लोगों का ध्यान अपनी तरफ आकर्षित करती थी। गांव में शाम के समय रेडियो पर कजरी बजती थी लेकिन आधुनिकता ने उसको भी निगल लिया। 

अब न पेडों पर पडने वाले झूले रहे और न/न साथ झूलने और गाने वाली सहेलियां, अब सावन सूना-सूना सा लगता है। पद्मश्री अवार्डी अजिता श्रीवास्तव ने बताया कि भारत गांवों का देश है और ग्रामीण जीवन का प्राण लोक संगीत में बसता है। लोकगीत ग्रामीणांचलो में महज मनोरंजन का साधन नहीं अपितु उनकी संवेदनाओं की अभिव्यक्ति है। एक समृद्ध परंपरा होने के बाद भी सरकार एवं श्रोताओं की उपेक्षा से क्षेत्रीय कलाकारों के बीच दर्द का माहौल बन गया है। लोक संगीत और लोक साहित्य आहिस्ता आहिस्ता लोक जीवन से पीछे छूटता जा रहा है। उन्होंने बताया कि जब कला की मुख्यधारा सूखने लगती है तब लोक कला से ही सहारा मिलता है। 

इसलिए जड़ों का स्वस्थ होना बहुत जरूरी है। कलाकारों को सुविधा और संरक्षण देने की अति आवश्यकता है ताकि समृद्धशाली सांस्कृतिक विरासत की धरोहर बची रहे। समृद्धशाली लोकगीत कजरी के मोहपास से भोजपुरी के सन्त कवि लक्ष्मीसखी, रसिक किशोरी आदि को प्रभावित किया, वहीं अमीर ख़ुसरो, बहादुरशाह ज़फर, सुप्रसिद्ध शायर सैयद अली मुहम्मद 'शाद', हिन्दी के कवि अम्बिकादत्त व्यास, श्रीधर पाठक, द्विज बलदेव, बदरीनारायण उपाध्याय 'प्रेमधन' आदि भी मुक्त नहीं रह सके। कजरी गायिका ने बताया कि भारतरत्न’ सम्मान से अलंकृत विख्यात शहनाई वादक उस्ताद विसमिल्ला खां की शहनाई पर तो कजरी और भी मीठी हो जाती थी। 

उन्होंने बताया कि वह कहा करते थे कि ‘कजरी को समृद्धशाली बनाए रखना है तो उसके गाने वालो को आगे बढाओ। उनकी बात अनसुनी रह गयी जिस कारण आज न गायक आगे बढ़े और न कजरी। फिल्में भी इसको प्रोत्साहित करने का एक बड़ा मंच है। यदि फिल्म निर्माता अपनी-अपनी फिल्मों में वर्षा ऋतु का सावन लोग गीत को समाहित करे तो इस विधा को विलप्त होने से बचाया जा सकता है।

वर्ष 1963 में प्रदर्शित भोजपुरी फ़िल्म 'बिदेसिया' में इस शैली का अत्यन्त मौलिक रूप प्रयोग किया गया। इस कजरी गीत की रचना अपने समय के जाने-माने लोक गीतकार राममूर्ति चतुर्वेदी ने की थी। उन्होंने बताया कि सावन माह में कजरी गीत को गाने की परंपरा सदियों पुरानी है। भारतीय संस्कृति की पहचान पारंपरिक लोकगीतों के विलुप्त होने से वातावरण सूना-सूना लग रहा है।

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