Jalaun: बेहमई हत्याकांड के बाद बैंडिट क्वीन पुलिसिया जाल और नाकाबंदी को बता रही थी धता, बोली- हां, वह फूलन देवी ही थी...
बेहमई हत्याकांड के बाद बैंडिट क्वीन हर पुलिसिया जाल और नाकाबंदी को धता बता रही थी।
बेहमई हत्याकांड के बाद बैंडिट क्वीन हर पुलिसिया जाल और नाकाबंदी को धता बता रही थी। सनातन महिला डिग्री कॉलेज की प्राचार्य डॉ. अमिता सिंह उस समय इंटर की छात्रा थीं।
जालौन, [राकेश द्विवेदी]। 14 फरवरी 1981 को बेहमई में सामूहिक हत्याकांड के बाद फूलन देवी की कोई खोज-खबर नहीं थी। पुलिस उसे जिंदा पकड़ना चाहती थी, जबकि फूलन अपनी बची जिंदगी सुरक्षित करना चाहती थी। बेखौफ और निर्मम फूलन इतनी जिद्दी थी कि जिस दिन उरई में उसे लेकर गोपनीय मीटिंग होने वाली थी, उसके कुछ घंटे पहले वह अपनी निडरता दिखाते हुए एक दुकान से प्रसाधन सामग्री खरीद रही थी।
जब अधिकारियों को ये बात पता चली तो उनके होश उड़ गए कि चारों तरफ जाल बिछा होने और सीमा पर कड़ी नाकेबंदी के बाद भी आखिर फूलन देवी निकल कैसे निकल गई? उस दिन फूलन को अपनी आंखों से देखने वाली सनातन महिला डिग्री कॉलेज की प्राचार्य डॉ. अमिता सिंह तब इंटर की छात्रा थीं।
14 फरवरी 1981 को फूलन देवी और उसके गैंग ने कानपुर देहात के बेहमई गांव में 22 ग्रामीणों को मौत के घाट उतार दिया था। इस जघन्य हत्याकांड से पूरा प्रदेश थर्रा उठा था। पुलिस हाथ धोकर फूलन के पीछे पड़ी थी। लेकिन वह पकड़ में नहीं आ रही थी। दरअसल, फूलन देवी का तब तक किसी के पास कोई सही चित्र नहीं था। साल 1982 में होली के अगले दिन 11 मार्च को भाई दूज थी।
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डॉ अमिता सिंह
दोपहर करीब दो बजे घंटाघर स्थित विजय पांडेय के मकान के बाहर स्थित मुन्ना जनरल स्टोर पर अमिता सिंह सामान खरीदने पहुंची। इसी दौरान वहां एक ठेठ देहाती और दबंग सी दिखने वाली महिला आई। पुलिस की वर्दी पहने यह महिला चेकदार गमछे से सिर और मुंह ढके थी। उसके साथ पुलिस वर्दीधारी दो पुरुष थे।
महिला ने दुकानदार से सौंदर्य का कुछ सामान मांगा। लेकिन दुकानदार अमिता का सामान निकालने में व्यस्त रहा। इससे झल्लाई उस महिला ने गाली देते हुए दुकानदार को जल्दी सामान देने के लिए धमकाया। सामान मिलते ही वह तेज कदमों से साथियों के साथ मच्छर चौराहे की ओर चली गई। यह महिला कोई और नहीं, फूलन देवी थी। उसके साथ आया व्यक्ति मानसिंह यादव था। अमिता सिंह को बाद में इसका पता चला। वह बताती हैं कि महिला का अक्खड़पन और गाली भरी भाषा सुनकर बहुत खराब लगा था। मैं सामान लेकर घर आ गई। थोड़ी देर बाद पता चला कि आज शाम घर में कोई सीक्रेट मीटिंग है।
अमिता के पिता कीरत सिंह सेंगर फौजदारी के मशहूर वकील थे। इस नाते पुलिस अधिकारियों से उनका मेल-मिलाप था। शाम को होने वाली मीटिंग इतनी गोपनीय थी कि मुंशी, चपरासी को घर भेज दिया गया। गेट के बाहर कोई गाड़ी या पुलिस कर्मी भी नहीं ठहरा। कीरत सिंह के दफ्तर में डीआईजी झांसी, एसएसपी जालौन, एसपी ग्वालियर और एसपी भिंड के अलावा सिर्फ बादशाह सिंह भदौरिया ही मौजूद थे।
बादशाह सिंह इसलिए थे क्योंकि वही फूलन देवी को ठीक से जानते थे। मीटिंग फूलन को जल्द गिरफ्तार करने के लिए थी। डॉ. अमिता सिंह के मुताबिक माँ ने नाश्ता बनाया। पीछे के दरवाजे से वह नाश्ता लेकर पहुंची तो एकबारगी अधिकारी चौंके, फिर समझ गए कि वकील साहब की बेटी हूं।
इसी दौरान उनकी नजर मेज पर रखी एक स्क्रैच वाली फोटो पर पड़ी तो सहसा मुंह से निकल गया 'अरे इसे तो आज दोपहर ही दुकान से सामान खरीदते देखा है।' यह सुनकर सभी अधिकारी दंग रह गये। एसपी ग्वालियर ने पास बुलाकर पूरा घटनाक्रम पूछा। महिला कैसी थी? क्या कर रही थी, उसके बोलने का ढंग कैसा था? इस पर उन्होंने जो देखा-सुना था, सब बता दिया। इस घटना के पंद्रह दिन बाद जब उसी फोटो के साथ अखबार में खबर छपी, तब अमिता को पता चला कि उन्होंने जिस दबंग महिला को देखा था, वह दस्यु सुंदरी फूलन देवी थी।
आत्म समर्पण के 18 साल बाद नई दिल्ली में हुई हत्या
फूलन देवी को उत्तर और मध्य प्रदेश की पुलिस जीवित पकड़ना चाहती थी, लेकिन 13 फरवरी 1983 को फूलन ने मानसिंह और अन्य डकैतों के साथ भिंड में मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के समक्ष समर्पण कर दिया। 22 वर्ष पहले जब फूलन देवी सांसद थीं, तब 25 जुलाई 2001 को नई दिल्ली में उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।
