बरेली: काबिलियत की डिग्रियों को चिढ़ा रहा बेरोजगारी का ठप्पा...युवा खा रहे धक्का, जानिए मामला

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सेवायोजन कार्यालय में रोजगार मेले में पहुंचे युवाओं में छलका बेरोजगारी का दर्द

अनुपम सिंह, बरेली। पढ़ाई-लिखाई में लाखों रुपये फूंकने के बाद सुनहरे कॅरियर के सपने संजोए युवाओं को लाख कोशिशों के भी नौकरियों की राह तलाशे नहीं मिल रही है। महंगाई के इस दौर में आठ से दस हजार की नौकरी भी उन्हें नसीब नहीं हो रही हैं। तमाम डिग्रियां होने के बावजूद उन पर बेरोजगारी का ठप्पा लगा हुआ है, इसे हटाने के लिए वे छटपटा रहे हैं।

सोमवार को स्टेशन रोड पर स्थित सेवायोजन कार्यालय में लगे रोजगार मेले में इंटरव्यू देने पहुंचे युवाओं में यह छटपटाहट साफ दिखी। उनके अंदर बेरोजगारी का दर्द भी था। कोई पांच साल तो कोई सात से हुनरमंद होने के बाद भी नौकरी के लिए धक्का खा रहा है। इंटरव्यू के लिए जाते वक्त वे खुद को जितना असहज मान रहे थे, आते वक्त उनके चेहरे पर इस बात की तसल्ली थी कि शायद इस बार नौकरी मिल जाएगी। उन पर लगा बेरोजगारी का ठप्पा हट जाएगा। हालांकि कुछ युवाओं का नौकरी पाने का सपना साकार हुआ तो कुछ को मायूसी ही हाथ लगी।

फरीदपुर के करनपुर निवासी संजीव कुमार ने बताया कि पांच साल पहले एग्रीकल्चर इंजीनियरिंग में डिप्लोमा किया था। इससे पहले भी रोजगार मेले में इंटरव्यू दे चुके है। नौकरी मिली थी लेकिन एक महीने ही कर पाया था। हद से ज्यादा दबाव और टारगेट पूरा करने के बाद 10 हजार रुपये मिलते थे। काफी समय से खाली हैं। शादी भी हो गई है। यही सोचकर आए हैं कि नौकरी करने से कुछ आर्थिक मजबूती मिलेगी।

फरीदपुर के केसरपुर निवासी भारत सिंह ने इकनॉमिक्स में एमए किया है। कंप्यूटर में ट्रिपल-सी कर रखा है। 2017 में पढ़ाई पूरी हो गई थी। नौकरी अब तक नहीं मिली है। रोजगार के लिए मारे-मारे घूम रहे हैं। वह बताते हैं कि उन पर खुद के खर्चे से लेकर परिवार की जिम्मेदारी है। यहां जो रुपये मिलेंगे, उससे परिवार नहीं चल पाएगा, लेकिन कुछ भला हो जाएगा। मजबूरी में इतने कम पैसे की नौकरी करने की सोची है।

शहर की रेलवे कॉलोनी में रहने वाले सरजू अपने भाई अभिषेक के साथ रोजगार मेले में पहुंची थीं। बोलीं, डबल एमए के बाद एमएससी कर चुकी हैं। बीटेक कर रहीं हूं। नौकरी के लिए कई जगह प्रयास किए लेकिन कुछ कामयाबी नहीं मिली। मजबूरी में बेरोजगारी में पंजीकरण कराना पड़ा। सोचती हूं कि छोटी-मोटी कोई भी नौकरी मिल जाए तो पढ़ाई के लिए कुछ पैसे निकलते रहेंगे। हम लोगों के लिए सरकार को सोचना चाहिए।

जाटवपुर में रहने वाली शिवानी कहती हैं कि सरकार नौकरियां नहीं दे रही हैं। कई बार प्रयास करने के बाद भी कोई सफलता नहीं मिली। कब तक बेरोजगार घर में बैठती। पढ़ाई-लिखाई में मां-बाप ने इतना खर्चा किया। कोई हमें बेरोजगार कहता है तो बहुत बुरा लगता है। यहां जो कंपनियां नौकरी देतीं हैं, पैसे बहुत कम हैं लेकिन खाली बैठे रहने से कुछ करना बेहतर है। यही सोचकर इंटरव्यू दिया है।

आए थे इंटरव्यू देने...चर्चा नेताओं के वादाखिलाफी की
सेवायोजन कार्यालय में इंटरव्यू देने पहुंचे काफी युवा बरामदे में खड़े होकर आपस में बात कर रहे थे। वे कह रहे थे कि आज के समय में नौकरी मिलना बहुत मुश्किल हो गया है। बेरोजगारी इतनी हावी हो चुकी है कि छोटी-मोटी जॉब भी मिलना मुश्किल हैं। मिलती भी हैं तो उनके नियम-कानून इतने हैं कि झेल पाना संभव नहीं लेकिन करेंगे नहीं तो जाएंगे कहां, जरूरतें भी तो हैं।

मुफ्त की रोटियां कब तक तोड़ते रहेंगे। कुछ तो करना ही पड़ेगा। कुछ युवाओं ने कहा कि चुनाव में नेता बड़े-बड़े दावे करते हैं। सार्वजनिक मंचों से लाखों लोगों को रोजगार देने का ढिंढोरा पीटा जाता है, लेकिन होता कुछ नहीं है। चुनाव के समय घर-घर ड्योढ़ी नापने वाले नेता भी बाद में ओझल हो जाते हैं। इस बीच एक युवती ने कहा कि यह चुनावी वर्ष है। इस नौकरी के साथ बाकी तैयारियां भी करते रहो, शायद नौकरियां निकलें तो कुछ भला हो जाए।

हाईलाइटर-

-115 बेरोजगारों ने कराया पंजीकरण।
-07 कंपनियां आईं थी रोजगार मेले में।
-39 युवाओं का अगल-अलग कंपनियों में चयन हुआ।
-83229 युवा बेरोजगार पंजीकृत हैं सेवायोजन कार्यलय में।
-57197 पुरुष बेरोजगार।
-26032 महिला बेरोजगार।

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