कश्मीरियत छोड़ बूजी हुईं शिक्षा की कनपुरिया शिल्पी, मुंह बोले भाई की याद में बना दिया दीनदयाल उपाध्याय विद्यालय
कश्मीरियत छोड़ बूजी हुईं शिक्षा की कनपुरिया शिल्पी।
कश्मीरियत छोड़ बूजी हुईं शिक्षा की कनपुरिया शिल्पी। मुंह बोले भाई की याद में दीनदयाल उपाध्याय विद्यालय बना दिया।
कानपुर, अमृत विचार। मुंह बोले भाई की स्मृति में शिक्षा संस्थान खड़ा दिया था। नाम है पंडित दीनदयाल उपाध्याय सनातन धर्म विद्यालय। शिक्षानुरागी श्रीमती सुशीला देवी का 25 अगस्त को जन्मदिन होता है। उनकी स्मृति में विद्यालय के स्टूडेंट्स ने विज्ञान प्रदर्शनी आयोजित की है। कश्मीर की रहने वाली सुशीला का ब्याह बैरिस्टर नरेंद्रजीत सिंह से हुआ था।
वह क्षेत्रीय संघचालक (पूर्वी उत्तरप्रदेश) वीरेंद्रजीत पराक्रमादित्य सिंह की मां थीं। बहुत कम लोग जानते होंगे कि सुशीला देवी का जन्म 25 अगस्त 1914 को जम्मू-कश्मीर राज्य के दीवान बद्रीनाथ जी व श्रीमती विद्यावती जी के घर में ज्येष्ठपुत्री के रूप में हुआ था। पिता से प्रशासनिक क्षमता व मां से धर्म प्रेम उन्हें विरासत में मिला था।
कानपुर के प्रख्यात समाजसेवी रायबहादुर विक्रमाजीत सिंह की पुत्रवधू बनकर आयीं तो ससुराल पक्ष से उन्हें शिक्षा संस्थाओं के प्रति लगाव भी प्राप्त हुआ। कानपुर में शिक्षा का माहौल उत्पन्न करने में उनका अविस्मरणीय योगदान रहा। सुशीला जी के पूर्वज ऐमनाबाद (वर्तमान पाकिस्तान) के निवासी थे। पंजाब व जम्मू-कश्मीर में इनकी विशाल जागीरें थीं। बताते हैं कि इनके परदादा कृपारामजी ने जम्मू के राजा गुलाबसिंह को कश्मीर राज्य खरीदने में सहयोग दिया था। बद्रीनाथजी राजा हरिसिंह के निजी सचिव भी थे।
इस परिवार की ओर से कई शिक्षा संस्थाएं, अनाथाश्रम, विधवाश्रम व धर्मशालाओं आदि का संचालन किया जाता है। विभाजन के बाद उनकी अथाह सम्पत्ति पाकिस्तान व पाक अधिकृत कश्मीर में रह गयी; पर सुशीला जी ने कभी उसकी चर्चा कानपुर में नहीं की। 1935 में उनका (सुशीलादेवी) का विवाह बैरिस्टर नरेन्द्रजीत सिंह से हुआ, जो आगे चलकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रांत संघचालक बने।

सुशील देवी (फ़ाइल फोटो)
कानपुर में सुशीला जी को सब ‘रानी साहिबा’ कहने लगे; पर यह सम्बोधन धीरे-धीरे ‘बूजी’ में बदल गया। 1919 में पिता के देहांत के कारण उनका विवाहोपरांत भी संपत्ति की देखभाल के लिए कश्मीर जाना होता था। विभाजन व फिर 1965 के युद्ध के कारण उन्हें कश्मीर छोड़ना पड़ा वह अपने कर्मचारियों के साथ जम्मू आ गयीं। धीरे-धीरे बूजी ने स्वयं को कानपुर के गरम मौसम व घरेलू वातावरण के अनुरूप ढाल लिया। बैरिस्टर नरेंद्रजीत सिंह जब संघ में सक्रिय हुए तो उनके घर वरिष्ठ कार्यकर्ता आने लगे। ‘बूजी’ स्वयं रुचि लेकर सबकी आवभगत करती थीं।
उनके परिवार से मिली जानकारी के मुताबिक 1947 में संघ के तत्कालीन सरसंघचालक गुरुजी (एमएस गोलवरकर) से भेंट के बाद राजा हरिसिंह ने जम्मू-कश्मीर राज्य का भारत में विलय किया। इसमें सरदार पटेल के साथ ही पर्दे के पीछे ‘बूजी’ की भी बड़ी भूमिका थी। 1948 में संघ पर प्रतिबंध के समय बैरिस्टर साहब जेल चले गये।
इस दौरान एक साध्वी की तरह बूजी भी साधारण भोजन करते हुए भूमि पर ही सोयीं। दीनदयाल जी में ‘बूजी’ भाई की छवि देखती थीं। उनकी हत्या के बाद ‘बूजी’ ने श्रद्धांजलि सभा में ही संकल्प लिया कि एक दीनदयाल चला गया, तो क्या हुआ, मैं ऐसी संस्था बनाऊंगी, जिससे सैकड़ों दीनदयाल निकलेंगे। उनका यह सपना साकार हुआ। दीनदयाल विद्यालय कुछ ऐसा ही तैयार हुआ। लोग ‘बूजी’ को याद करने लगे।
इस प्रकार कानपुर में दीनदयाल उपाध्याय सनातन धर्म विद्यालय की स्थापना हुई। यों तो इस परिवार द्वारा कानपुर में अनेक विद्यालय चलाये जाते हैं, बूजी इस विद्यालय की विशेष देखरेख करती थीं। इसके अतिरिक्त उन्होंने अपने पूर्वजों के नाम से भी शिक्षा संस्थाओं का निर्माण किया।
अनंतनाग के पास नागदंडी आश्रम के स्वामी अशोकानंद उनके आध्यात्मिक गुरु थे। बूजी द्वारा किया गया उनके प्रवचनों का संकलन ‘तत्व चिंतन के कुछ क्षण’ शीर्षक से प्रकाशित किया गया। इस प्रकार जीवन भर सक्रिय रहते हुए दो मई, 1973 को श्रीमती सुशीला देवी ‘बूजी’ का देहांत हुआ।
