सिर्फ नाम का रह गया सावन, नहीं दिखती झूलों पर खिलखिलाती युवतियों की टोली
संडीला / हरदोई, अमृत विचार। सावन का महीना आज (बुधवार) से समाप्त हो जाएगा। इस महीने में अब मस्ती पहले जैसी नहीं दिख रही ना तो ग्रामीण क्षेत्रों में झूला झूलती युवतियों की टोली दिखती है और न ही सावन के गीतों के स्वर गूंजते हैं। बदलते समय में लोगों का मिजाज भी बदल गया है और उसकी आड़ में भारतीय संस्कृति की झलक दिखाती मान्यताएं और क्रियाएं भी विलुप्त होने पर हैं। पहले गांव गलियों में झूला देखकर लोग समझ लेते थे कि सावन आ गया। लेकिन अब ऐसा नहीं है।
पहले सावन के महीने का इंतजार साल की शुरुआत से होने लगता था। किशोर और युवा भी झूले का आनंद लेते थे। नव विवाहिता अपने मायके आकर सहेलियों के साथ झूला झूलती थी। सावन को लेकर एक अलग उत्साह होता था लेकिन धीरे-धीरे समय के साथ सब बदल गया। अब ना तो झूला डालने वाले लोग रहे और ना ही झूलने वालों की टोलिया। एकाध स्थान पर रस्सी का झूला झूल रहे बच्चे सावन की याद दिला देते हैं। गांव सांक निवासी जूली गौतम, शैला गौतम, प्रीति, नैंसी का कहना है कि अब न तो कोई झूला डालता है और ना ही झूलने वालों में उत्सुकता होती है। बुंदेली गीत हो या स्थानीय गीत जब सभी सहेलिया एक साथ मिलकर गाती थी तो आनंद आता था अब सावन का पर्व सिर्फ औपचारिकता बन कर रह गया है ।
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