Teacher's Day 2023: कानपुर की शिक्षिका बेटियों की शिक्षा के लिए करती संघर्ष, हर साल गोद लेती एक बेटी, पढ़ें- पूरी खबर
कानपुर में शिक्षिका शशि मिश्रा ने बेटियों की शिक्षा के लिए किया संघर्ष।
कानपुर में शिक्षिका शशि मिश्रा ने बेटियों की शिक्षा के लिए किया संघर्ष। वह हर साल एक बेटी गोद लेती हैं। इसके साथ ही उन्होंने गांव में शिक्षा आश्रम भी बनाया।
कानपुर, अमृत विचार। बेटियों को पढ़ाने और उन्हें आगे बढ़ाने के जुनून ने एक शिक्षिका ने पूरे गांव में शिक्षा की मशाल जला दी। शिक्षिका शशि मिश्रा ने गांव की बेटियों को स्कूल तक लाने के लिए संघर्ष किया। यहां तक कि खुद के वेतन से बेटियों को सुविधाएं मुहैया कराई। आज रिटायर होने के बाद वे उसी गांव में शिक्षा का आश्रम चला रही हैं। खास बात यह है कि वे हर साल एक बेटी को गोद लेकर उसकी शिक्षा के लिए पूरा खर्चा भी उठाती हैं।
शिक्षिका शशि मिश्रा ने बताया कि वर्ष 2008 में कटरी के शंकरपुर सराय में पूर्व माध्यमिक विद्यालय की शुरुआत हुई। उस वक्त वे यहां के गांव से परिचित हुईं। यहां के बारे में जाना तो पता लगा कि लगभग दस हजार की आबादी वाले गांव में केवल छह से सात लोग ही इंटर पास हैं। ऐसे में गांव की छात्राओं की स्थिति और खराब थी। वे स्कूल ही नहीं जाती थीं।
ऐसे में स्कूल के लिए जब उनके अभिभावकों से बातचीत की गई तो उन्हें विरोध का भी सामना करना पड़ा। धीरे-धीरे स्कूल में उस साल केवल 17 बच्चे आए जिनमें 9 छात्राएं थीं। बच्चों ने जब स्कूल का माहौल देखा तो गांव में भी चर्चा शुरू हो गई। रोजाना वे गांव में जाकर अभिभावकों को समझाती थीं, जिससे वर्ष 2013 तक स्कूल में बच्चों की संख्या 170 हुई जिनमें 70 फीसदी छात्राएं थीं। उन्होंने कहा कि वे इसी वर्ष रिटायर हुई है। रिटायर होने के बाद इस बात की खुशी है कि गांव में अब हर घर में बेटी कॉलेज जा रही है।
अतिरिक्त कक्षाएं भी चलाईं
शिक्षिका शशि मिश्रा ने बताया कि बेटियों को पढ़ाने के दौरान एक समय ऐसा भी आया जब स्कूल से पढ़ी बेटियां स्कूल से पास होकर दूसरे स्कूल पहुंची। वहां पर पढ़ाई के दौरान जो विषय कमजोर थे उसे बेहतर करने के लिए स्कूल के ही पास एक झोपड़ी में रोजाना निशुल्क अतिरिक्त कक्षाएं कराईं। इससे बेटियों को पढ़ाई में किसी तरह की कोई समस्या नहीं आई।
बच्चों को दी साइकिल
उन्होंने यह भी बताया कि स्कूल के कई छात्र-छात्राएं ऐसे भी रहे जिन्हें अपनी आगे की पढ़ाई पूरी करने के लिए दस से बारह किलोमीटर तक रोजाना सफर करना पड़ता था। बच्चों के घरों में किराए का बोझ न पड़े और उनकी पढ़ाई जारी रहे इसके लिए खुद के वेतन से बच्चों को साइकिल तक दिलाई।
अब चल रहा है आश्रम
शशि मिश्रा ने बताया कि वे इसी वर्ष स्कूल से रिटायर हुई हैं। रिटायर होने के बाद उन्होंने खुद के पैसों से गांव में ही एक आश्रम खोला है। यह आश्रम पं. योगेश पाण्डेय संस्कार आश्रम नाम से संचालित हो रहा है। इस आश्रम में गांव के बच्चे रहने के साथ ही निशुल्क पढ़ाई करते हैं।
