बरेली: 'नहीं मिली सपनों को मंजिल तो कहां जाएंगे...' आत्महत्या की फैक्ट्री बनता कोटा
डॉक्टर-इंजीनियर बनाने की फैक्ट्री कहा जाने वाला राजस्थान का यह शहर
शिवांग पांडेय, बरेली, अमृत विचार। अनिकेत को शायद यह शहर भूल गया होगा। पिछले साल ही वह भी उन युवाओं में शामिल था जो मम्मी-पापा का डॉक्टर बनने का सपना पूरा करने बड़े अरमान लेकर कोटा गया था और फिर नहीं लौटा। अनिकेत के परिवार के लिए भी इसके बाद सबकुछ खत्म हो गया। शास्त्रीनगर में रहने वाला यह परिवार शहर छोड़कर कहां गया, कुछ नहीं पता चला। ऐसे युवाओं की संख्या का तो शहर में कोई हिसाब नहीं है जो कोटा में लगा असफलता का दाग अब तक अपने माथे पर लिए घूम रहे हैं। लेकिन इसी शहर में ऐसे भी तमाम युवा हैं जो कोटा से तो असफल होकर लौटे, फिर भी हार नहीं मानी। तैयारी के लिए दूसरे माध्यम चुने और कामयाब होकर ही दम लिया।
बरेली के कोचिंग संस्थानों से मिले आंकड़ों को अगर उदाहरण माना जाए तो कोटा की सबसे ज्यादा कड़वी सच्चाई यह है कि वहां से कामयाब होकर लौटने वाले युवाओं का औसत बेहद कम है, फिर भी हर अभिभावक अपने बच्चों को डॉक्टर-इंजीनियर बनाने के लिए वहीं भेजने की योजना बनाता रहता है। हर साल हजारों बच्चे बरेली से कोटा जाते हैं। मनोविज्ञानियों का कहना है कि निम्न मध्यमवर्ग के कई अभिभावक इसके लिए काफी कुछ दांव पर लगाते हैं। बच्चों को कुछ बनाने का सपना इस कदर जहन पर हावी होता है कि उनके साथ सारी बातें घूम-फिरकर पढ़ाई पर आती रहती हैं। बच्चों पर मानसिक दबाव बढ़ता रहता है और कई बार इतना बढ़ जाता है कि पढ़ाई करना मुश्किल हो जाता है और जब वे असफल होते हैं तो खुद को अपने मम्मी-पापा का गुनहगार समझने लगते हैं। कई बार अभिभावक भी इतना निराश हो जाते हैं कि बच्चों के साथ उनके व्यवहार में परिवर्तन आ जाता है।
कोटा में क्या होता है...
एक जैसा बोझिल रुटीन और कंपटीशन का प्रेशर... तैयारी छोड़कर चली आईं रिया
राजेंद्रनगर में रहने वाली रिया ने 2022 में इंटरमीडिएट की परीक्षा फर्स्ट डिवीजन में पास की थी। इसके नीट की तैयारी के लिए कोटा चली गईं। बकौल रिया, मुझे लगा था कि कोटा में पढ़ाई का अच्छा माहौल मिलेगा, लेकिन लगातार एक कमरे में रहते और मेस का खराब खाते हुए जल्द ही मेरे जेहन में कोटा की वह सारी तस्वीरें धुंधली हो गईं जिनके बारे में पहले मैं सोचकर खुश होती थी। मेरा कमरा इतना छोटा था कि उसमें सिर्फ एक छोटे बेड, टेबल और चेयर की जगह थी। 10-15 मेस बदलने के बाद भी भूख मिटाने लायक खाना नहीं मिला। एक ही रुटीन और कंपटीशन के प्रेशर के साथ बोझिल माहौल से मुझे निराशा होने लगी। मैं इतनी परेशान हुई कि कोचिंग छोड़कर घर लौट आई। अब ऑनलाइन माध्यम से नीट की तैयारी शुरू की है।
आत्मविश्वास खोकर लौटे अभिषेक, घर पर मेहनत के बाद मिली कामयाबी
पुवायां (शाहजहांपुर) के अभिषेक गुप्ता भी 2017 में प्रथम श्रेणी में इंटरमीडिएट पास करने के बाद नीट की तैयारी के लिए कोटा पहुंचे थे। वह वहां एक साल रहे। अभिषेक ने बताया कि वह मध्यमवर्गीय परिवार से हैं। एक साल में करीब सवा लाख रुपये का खर्च आया। तैयारी तो कुछ खास नहीं हो पाई, वह एंग्जाइटी का शिकार होने के साथ आत्मविश्वास भी खो बैठे। साल भर कठिन परिस्थितियों से जूझने के बाद नीट में भी उनका चयन नहीं हुआ। निराश होकर घर लौटे, फिर घर पर ही तैयारी की और 2019 में नीट पास कर लिया। अब मुजफ्फरनगर के एक अर्द्धसरकारी मेडिकल कॉलेज में एमबीबीएस के आखिरी सेमेस्टर की परीक्षा की तैयारी कर रहे है। अभिषेक ने कहा कि कोटा जाने वालों पर इतना दबाव होता है कि वे सोशल नहीं हो पाते। आर्थिक हालात और कई दूसरे निजी कारण उन्हें विचलित करते हैं। अभिभावक उन्हें त्योहारों तक पर नहीं बुलाते। कोटा में रहने वाले ज्यादातर युवा दिन-रात अकेलेपन से जूझते हैं।
- कोटा से पढ़कर लौटे तिलहर (शाहजहांपुर) के शिवम वर्मा ने बताया कि वहां पढ़ाई के कठिन माहौल के साथ टेस्ट सीरीज और सिलेबस पूरा न होने से दिक्कत आने लगी थी। इससे उनकी एकाग्रता नष्ट हो गई। कोटा में आए दिन आत्महत्या की खबरें सुनकर उनके अभिभावक भी घबराने लगे थे। इस साल उन्होंने बरेली में ही पढ़ाई शुरू की है।
- बदायूं के नितिन ने बताया कि उन्होंने पिछले साल कोटा की एलन कोचिंग में प्रवेश लिया। इस कोचिंग इंस्टीट्यूट ने शत-प्रतिशत चयन का दावा किया था लेकिन वह वहां पहुंचे तो इतना दबाव महसूस किया कि तीन महीने तक पढ़ ही नहीं पाए। मुश्किल दिनचर्या, बाहर के खाने और कई दूसरी समस्याओं से परेशान होकर उन्होंने कोटा छोड़ दिया। अब बरेली में ही नीट की तैयारी कर रहे हैं।
मनोविश्लेषकों का नजरिया...
ब्रांडिंग के जाल में फंसते हैं, स्टेटस सिंबल भी समझते हैं अभिभावक
जिला अस्पताल में मनकक्ष के प्रभारी डॉ. आशीष कुमार कहते हैं कि कोटा में कामयाबी मिले न मिले लेकिन कुछ इस तरह देश भर में प्रचार किया गया है कि अभिभावकों को लगता है कि वहां बच्चों को पढ़ाना कामयाबी की गारंटी है। उन्हें यह भी लगता है कि कोटा में पढ़ाई का माहौल है, अपने इर्दगिर्द कंपटीशन का माहौल देखकर उनका बच्चा खुद ही मेहनत करने के लिए प्रेरित होगा। यह भी माना जाता है कि हर साल टॉप-10 टॉपर कोटा से ही निकलते है।कई अभिभावक स्टेटस सिंबल के तौर पर भी बच्चों को कोटा भेजते हैं। लेकिन बच्चों के साथ कोटा में अलग ही हालात होते हैं जिन्हें उनके अभिभावक नहीं समझ पाते। 15 से 22 साल के बच्चों में सामाजिक और भावनात्मक समझ कम होती है, इसलिए वे डिप्रेशन और एंग्जाइटी के शिकार हो जाते हैं। उधर, जिन अभिभावकों की आर्थिक हालत मजबूत नहीं होता, उनका विश्वास भी जल्द डगमगा जाता है।
बेतहाशा दबाव में क्रिएटिविटी खोकर चौतरफा तनाव में घिर जाते हैं बच्चे
मनोवैज्ञानिक डॉ. हेमा खन्ना का कहना है कि प्रतियोगी माहौल की जद्दोजहद युवाओं के क्रिएटिविटी के स्तर में कमी पैदा करती है। धीरे-धीरे नकारात्मकता हावी होती है तो वे पढ़ाई के नए तरीके के साथ सामंजस्य नहीं बैठा पाते। उन्होंने बताया कि 11 से 21 साल तक किशोरावस्था होती है। प्रारंभिक किशोरावस्था यौवन के साथ शुरू होती है जो आमतौर पर 10वीं और 12वीं के सालों के साथ मेल खाती है। कोटा में रोज आठ घंटे की कक्षा का रुटीन है। उसके बाद टेस्ट सीरीज की तैयारी, खाना-पीना और सोना होता है। इस सबके बीच बच्चे रविवार को भी पढ़ाई के दबाव और तनाव में रहचे हैं। उनकी दिलचस्पी दूसरे कामों में कम होती जाती है जो तनाव को और बढ़ा देती है।
और भी विकल्प हैं लेकिन...
बरेली कॉलेज की मनोविज्ञान विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ. सुविधा शर्मा कहती हैं कि अभिभावक अपने बच्चों का भविष्य सुरक्षित करने के लिए उन्हें डॉक्टर या इंजीनियर बनाना चाहते हैं। कोई और विकल्प न चुनने से भी दबाव बढ़ता है। इस समय सोशल मीडिया इंफ्यूएनसर, स्टार्ट अप और दूसरे कई विकल्प हैं जहां बच्चे अपने भविष्य को सुरक्षित कर सकते हैं लेकिन ज्यादातर अभिभावक इन विकल्पों पर विचार नहीं करते।
विकल्पहीनता की मार... जेईई से ज्यादा नीट की तैयारी करने वालों ने दी जान
नीट की तैयारी कराने वाले शिक्षक मोहम्मद कलीम के मुताबिक कोटा में जिन बच्चों ने आत्महत्या की, उनमें ज्यादातर नीट की तैयारी करने वाले बच्चे थे। कारण यह है कि जेईई की परीक्षा उत्तीर्ण न कर पाने पर अभिभावकों के लिए निजी इंजीनियरिंग कॉलेज में बीटेक या दूसरे संबंधित कोर्स कराने का विकल्प रहता है। उनकी फीस भी मध्यमवर्गीय परिवार जुटा लेते हैं। इसके अलावा जेईई की परीक्षा साल में दो बार होती है जिसकी वजह से बच्चों को ज्यादा मौके मिलते हैं लेकिन नीट साल में एक बार ही होती है और एक मौका गंवाने पर पूरा साल बर्बाद होता है। नीट पास न कर पाने ज्यादातर अभिभावकों के लिए बच्चों को प्राइवेट संस्थान में एमबीबीएस, बीडीएस या बीएमएस कराना नामुमकिन की हद तक मुश्किल होता है क्योंकि उनकी फीस बहुत ज्यादा होती है। इसी कारण जेईई के मुकाबले नीट बच्चों पर ज्यादा दबाव बनाती है।
बहुत कड़वी है कोटा की सच्चाई
डॉक्टर और इंजीनियर बनाने की फैक्ट्री कहे जाने वाले राजस्थान के कोटा शहर की पहचान अब दागदार हो चुकी है। देश भर के अभिभावकों के सपनों की इसी फुलवारी में अब उनके बच्चों की खुशियां दफन हो रही हैं। डॉक्टर बनने का अरमान लेकर एक और छात्रा के सोमवार को आत्महत्या करने के बाद यहां इसी तरह इस साल माता-पिता के सपनों को पूरा करने में असफल होकर जान गंवाने वाले बच्चों की संख्या 26 हो गई। कोटा जाकर कुछ बनने का सपना अब डरावना हो गया है। हमारे शहर बरेली से हर साल नीट और जेईई की तैयारी के लिए कोटा जाने वाले विद्यार्थियों की तादाद पांच हजार से ज्यादा है। इनमें से एक या दो प्रतिशत विद्यार्थियों के ही कामयाबी पाने का औसत है। बाकी 98 और 99 असफलता के बाद अवसाद या अपराधबोध का शिकार होकर लौटते हैं। अभिभावकों के सामने उनकी नजरें झुकी रहती हैं। कुछ बच्चे जो इस अपराधबोध के साथ माता-पिता से नजरें मिलाने की हिम्मत नहीं कर पाते, वही आत्महत्या का रास्ता चुन लेते हैं।
आंकड़ों के अनुसार बरेली में इस साल 13 केंद्रों पर हुई नीट के लिए 8980 विद्यार्थी पंजीकृत थे जिनमें से 8760 ने परीक्षा दी। जेईई में इस साल करीब 10 हजार परीक्षार्थी बैठे। 5000 युवा औसतन हर साल नीट और जेईई की तैयारी के लिए बरेली से जाते हैं कोटा
नीट देने वालों की संख्या 21 लाख के भी पार
देश में मेडिकल कॉलेज की कुल संख्या 704 है। सरकारी मेडिकल कॉलेज 379 और निजी कॉलेज 315 हैं। इनमें एमबीबीएस की 90,825, बीडीएस की 27,948, आयुष की 52,720, पशु चिकित्सा की 603 और एम्स एमबीबीएस की 1899 सीटें हैं। इनके परीक्षा देने वालों की संख्या 21 लाख से ज्यादा होती है।
जेईई में हर साल बैठते हैं 10 लाख परीक्षार्थी
देश में बीटेक कॉलेजों की संख्या 4448 है, सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेजों की संख्या 702 और निजी कॉलेजों की संख्या 3578 है। आईआईटी संस्थान 26 हैं। इनमें प्रवेश के लिए हर साल औसतन 10 लाख युवा परीक्षा देते हैं।
वर्ष वार नीट में शामिल परीक्षार्थी
वर्ष 2023
परीक्षा केंद्र- 13
पंजीकृत परीक्षार्थी- 8,980
उपस्थित परीक्षार्थी- 8,760
वर्ष 2022
परीक्षा केंद्र- 11
पंजीकृत परीक्षार्थी- 8,024
उपस्थित परीक्षार्थी- 7,634
वर्ष 2021
परीक्षा केंद्र- 35
पंजीकृत परीक्षार्थी- 15,723
उपस्थित परीक्षार्थी- 15,094
कठिन डगर... कामयाबी की गारंटी नहीं
- हर साल करीब 2.15 लाख बच्चे प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए पहुंचते हैं कोटा।
- चार हजार रेंटल हाउस और पांच हजार पंजीकृत पीजी के 8x10 के कमरों में होती है तैयारी।
- 12 बड़ी और 55 छोटी कोचिंग, रहने-खाने का औसतन सालाना खर्च 2-2.25 लाख रुपये।
- इस साल 19 छात्र और चार छात्राओं ने दी जान, इनमें 17 कर रहे थे नीट की तैयारी।
-आत्महत्या करने वालों में बुलंदशहर का था सबसे कमउम्र 15 साल का छात्र।
- प्रयागराज के सबसे ज्यादा 22 साल उम्र के विद्यार्थी ने की आत्महत्या।
2023 में 12वीं पास करने वाले परीक्षार्थी
यूपी बोर्ड
पंजीकृत परीक्षार्थी- 46,664
उत्तीर्ण परीक्षार्थी- 32,473
सीबीएसई बोर्ड
पंजीकृत परीक्षार्थी- 7,575
उत्तीर्ण परीक्षार्थी- 6,814
आईसीएसई बोर्ड
कुल पंजीकृत परीक्षार्थी- 901
कुल उत्तीर्ण परीक्षार्थी- 891
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