डेंगू, मलेरिया से लड़ने में मददगार साबित हो सकती है भौगोलिक सूचना प्रणाली और ‘रिमोट सेंसिग’ तकनीक: विशेषज्ञ 

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Edited By Amrit Vichar
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नई दिल्ली। भौगोलिक सूचना प्रणाली (जीआईएस) और ‘रिमोट सेंसिंग’ तकनीक का उपयोग करके जलभराव प्रभावित क्षेत्रों और बरसाती जल निकासी नेटवर्क का मानचित्रण करने से हर साल मानसून के दौरान होने वाली डेंगू और मलेरिया जैसी मच्छर जनित बीमारियों को रोकने में मदद मिल सकती है। विशेषज्ञों ने यह बात कही है। जलभराव से मच्छरों, विशेष रूप से डेंगू फैलाने वाले ‘एडीज’ मच्छर के प्रजनन के लिए अनुकूल परिस्थितियां पैदा हो सकती हैं। 

एक ओर, अधिकारियों ने मानसून के दौरान फैलने वाली बीमारियों को नियंत्रित करने पर काम तेज कर दिया है तो दूसरी ओर, विशेषज्ञों का मानना ​​है कि प्रभावित क्षेत्रों की पहचान करने वाला एक मजबूत मॉडल होना चाहिए, जो समय रहते समस्या का समाधान करके जलभराव की समस्या से प्रभावित क्षेत्रों में डेंगू के प्रसार को रोक सके। भू-स्थानिक विशेषज्ञ और हैदराबाद के जवाहरलाल नेहरू प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय में अनुसंधान एवं विकास विभाग के पूर्व निदेशक मुरली कृष्ण अय्यंकी ने कहा, “रिमोट सेंसिंग और जीआईएस का उपयोग करके जलभराव प्रभावित क्षेत्रों और बरसाती नालों का समय-समय पर अवलोकन करने से मानसून के दौरान मच्छर जनित बीमारियों से प्रभावित इलाकों का पता लगाने और तत्काल कदम उठाने में मदद मिल सकती है।” 

जीआईएस पृथ्वी की सतह पर स्थिति से संबंधित जानकारी जुटाने के लिए एक कंप्यूटर प्रणाली है, जबकि रिमोट सेंसिंग किसी क्षेत्र की भौतिक विशेषताओं का पता लगाने और निगरानी करने की प्रक्रिया है। जलभराव प्रभावित क्षेत्रों और बरसाती नालों की समय-समय पर निगरानी के लिए रिमोट सेंसिंग और जीआईएस जैसी उन्नत प्रौद्योगिकियों का इस्तेमाल किया जा सकता है। अध्ययनों से पता चलता है कि ये प्रौद्योगिकियां काफी लाभदायक साबित हुई हैं। 

हालांकि, विशेषज्ञों का सुझाव है कि प्रभावित क्षेत्रों की पहचान के लिए एक मजबूत जीआईएस-आधारित मॉडल बीमारी की रोकथाम की योजना बनाने और उस पर काम करने में अधिक प्रभावी हो सकता है। इसे प्राप्त करने के लिए, जलभराव प्रभावित क्षेत्रों और बरसाती नालों की पहचान करने वाला एक व्यापक मानचित्र बनाना महत्वपूर्ण है। ‘प्रिसिजन हेल्थ’ के प्रौद्योगिकी विश्लेषक प्रेरक शाह ने कहा, “ग्रामीण क्षेत्रों में, जलभराव वाले क्षेत्रों का पर्याप्त उपग्रह डेटा होना चाहिए, जबकि शहरी क्षेत्रों में जलभराव प्रभावित इलाकों और बरसाती नालों दोनों पर विचार करना चाहिए।” 

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