आपत्तिजनक पोस्ट से जुड़ी एक याचिका पर कोर्ट ने की सुनवाई, कहा- किसी पोस्ट को लाइक करना उसे प्रकाशित या प्रसारित करना नहीं माना जाएगा
प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आपत्तिजनक पोस्ट से जुड़ी एक याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि सोशल मीडिया पर किसी पोस्ट को लाइक करने मात्र से संबंधित पोस्ट को प्रकाशित या प्रसारित करना नहीं माना जाएगा और उक्त कृत्य पर सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 67 लागू नहीं होगी। हालांकि उपरोक्त धारा में इलेक्ट्रॉनिक रूप में अश्लील सामग्री के प्रकाशन या प्रसारण के लिए सजा का प्रावधान है।
यह आदेश न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल की एकलपीठ ने मोहम्मद इमरान काजी की याचिका को स्वीकार करते हुए उसके खिलाफ दर्ज आरोप पत्र, संज्ञान आदेश और गैर जमानती वारंट को रद्द कर दिया। मामले में तथ्यों के अनुसार आरोपी के विरुद्ध आईपीसी की विभिन्न धाराओं और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 67 के अंतर्गत पुलिस स्टेशन मंटोला जिला आगरा में प्राथमिक की दर्ज की गई।
दरअसल आरोपी पर सोशल मीडिया पर कुछ उत्तेजक संदेश पोस्ट करने का आरोप लगाया गया था, जिसके परिणामस्वरुप मुस्लिम समुदाय के 600 -700 व्यक्तियों पर बिना अनुमति जुलूस निकालने के लिए इकट्ठा हो गए और जिससे शांति भंग होने का गंभीर खतरा उत्पन्न हो गया। मुकदमे की सुनवाई के दौरान संबंधित जांच अधिकारी ने प्रस्तुत किया कि आरोपी को चौधरी फरमान उस्मान की एक पोस्ट को लाइक करने का आरोप था।
कोर्ट ने दोनों पक्षों के द्वारा दिए गए तर्कों को सुनने के बाद कहा कि केस डायरी में आरोपी के खिलाफ यह आरोप है कि उसने गैरकानूनी सभा के लिए केवल एक व्यक्ति के पोस्ट को लाइक किया था। हालांकि इसे पोस्ट को प्रकाशित या प्रसारित करने के बराबर नहीं माना जाएगा। आरोपी के फेसबुक और व्हाट्सएप अकाउंट में कोई आपत्तिजनक पोस्ट उपलब्ध नहीं है, जिससे यह साबित हो सके कि उक्त पोस्ट आपत्तिजनक था।
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