Kanpur: कीटनाशक और प्रदूषण से बढ़ी बच्चेदानी में ट्यूमर की समस्याएं, अनियमित खानपान और बिगड़ी दिनचर्या भी जिम्मेदार
कानपुर में कीटनाशक और प्रदूषण से बढ़ी बच्चेदानी में ट्यूमर की समस्याएं।
कानपुर में कीटनाशक और प्रदूषण से बच्चेदानी में ट्यूमर की समस्याएं बढ़ी। अनियमित खानपान और बिगड़ी दिनचर्या भी इसकी जिम्मेदार है।
कानपुर, [विकास कुमार]। खाने-पीने की वस्तुओं में कीटनाशक, तेजी से बढ़ता प्रदूषण और अनियमित दिनचर्या की वजह से भी महिलाओं में बच्चेदानी के ट्यूमर के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। बच्चेदानी के ट्यूमर से पीड़ित अविवाहित महिलाओं की जान बचाने के लिए अक्सर बच्चेदानी निकालनी पड़ती है, इसके बाद वह मां बनने के सुख से वंचित हो जाती हैं।
फसलों में अधिक कीटनाशक दवाओं का इस्तेमाल, वायु प्रदूषण, अनियमित दिनचर्या और खानपान में जंक फूड का अधिक सेवन विवाहित और अविवाहित दोनों ही श्रेणी की महिलाओं को बच्चेदानी के ट्यूमर का शिकार बनाकर संतान सुख से दूर कर सकता है।
विशेषज्ञ चिकित्सकों के मुताबिक तंबाकू के धुएं से तो बचा जा सकता है, लेकिन जिस प्रदूषित हवा में हम सांस ले रहे हैं, प्रदूषित पानी और भोजन का सेवन कर रहे हैं, उसे बचना मुश्किल है। इस वजह से किशोरियों, युवतियों व महिलाओं को अंडाशय में होने वाले ट्यूमर की समस्या से जूझना पड़ रहा है। ऐसे में पेट दर्द, भारीपन, धीरे-धीरे पेट फूलना या आकार बढ़ने जैसी समस्या को नजरअंदाज करना महिलाओं के लिए खतरे की घंटी जैसा है।
दो साल में 100 विवाहित व 20 अविवाहित को हुआ ट्यूमर
जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के जच्चा-बच्चा अस्पताल की स्त्री रोग विशेषज्ञ प्रो.सीमा द्विवेदी के मुताबिक आहार, विहार और विचार में हो रहे बदलाव से महिलाओं में बच्चेदानी के ट्यूमर की समस्या आम होती जा रही है। जीवनशैली में सुधार कर इससे बचा जा सकता है।
उनके अनुसार अस्पताल में बीते दो साल में सौ विवाहित महिलाएं अंडाशय में ट्यूमर की समस्या से पीड़ित होकर आई हैं। इनमें से कई महिलाओं की जान बचाने के लिए बच्चेदानी निकालनी पड़ी है। बीते दो साल में 20 अविवाहित महिलाओं में भी बच्चे के आकार का ट्यूमर मिला है। इनमें से चार युवतियों की बच्चेदानी निकालनी पड़ी। अब वह संतान का सुख नहीं उठा सकती हैं।
कीटनाशक से हाईब्लड प्रेशर की समस्या बढ़ती
जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग की प्रो. गरिमा गुप्ता ने बीते एक साल में 60 गर्भवती महिलाओं पर पेस्टिसाइड्स के प्रभाव को लेकर शोध किया है। उन्होंने बताया कि गर्भावस्था के दौरान कीटनाशक दवा का पास होना या संपर्क में आना काफी खतरनाक होता है। हवा व पानी के माध्यम से भी यह कीटनाशक गर्भवती को दिक्कत पहुंचाते है। खून में कीटनाशक का स्तर अधिक होने से गर्भवती में बीपी बढ़ने की समस्या अधिक देखी गई है। यह बच्चे व मां दोनों के लिए काफी खतरनाक है।
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