बरेली: कभी ब्लैक में बिकती थीं बंदूकें... अब कौड़ियों का मोल नहीं
दुकानदारों का दर्द... दुकानों में पड़ी बंदूकों की अहमियत कबाड़ से ज्यादा नहीं, फिर भी सुरक्षित रखने के साथ रखरखाव करना मजबूरी
बरेली, अमृत विचार। बहुत पुरानी बात नहीं है, जब बंदूक का भी क्रेज लोगों के सिर चढ़कर बोलता था। इंडियन ऑर्डिनेंस की बंदूकों की कीमत 35 से 40 हजार तक की थी और लोग उसे ब्लैक में भी खरीदने को तैयार रहते थे। नए लाइसेंस पर रोक लगने के साथ बंदूकों से लोगों का मोह भंग होने की सजा अब शस्त्र दुकानदार भुगत रहे हैं। उनकी मुश्किल यह है कि दुकानों में जो बंदूकों का ढेर पड़ा है, उसकी अहमियत उनके लिए कबाड़ से ज्यादा नहीं रह गई है, लेकिन नियमों में ऐसे बंधे हैं कि उनका रखरखाव करना उनकी मजबूरी है। उसका किसी भी तरह कोई निस्तारण भी नहीं कर सकते।
शस्त्र दुकानदार कहते हैं कि किसी को उम्मीद नहीं थी कि शस्त्र लाइसेंसों पर रोक इतनी लंबी खिंच जाएगी। जब रोक नहीं थी और लोगों को बंदूक रखने का शौक था, उस वक्त ऑर्डिनेंस से भी बंदूकें मिलना आसान नहीं था।
यही वजह है कि उन्होंने तमाम सेकेंडहैंड बंदूकों को भी खरीदकर उनका स्टॉक इकट्ठा कर लिया, अब यह बंदूकें जैसी की तैसी पड़ी हैं। दुकानों पर नई, सेकेंडहैंड और लाइसेंसधारकों की जमा की गई बंदूकों का ढेर लगा हुआ है जो उनके लिए सिरदर्द बन गया है। वे गाहे-बगाहे लाइसेंसधारकों को फोन करते हैं कि वे अपनी बंदूक उठाकर ले जाएं लेकिन फिर भी वे लोग नहीं आ रहे हैं। कोई कहता है कि जरूरत होगी तो लेने आ जाएंगे तो कोई सीधे-सीधे बंदूक वापस लेने से ही इन्कार कर देता है।
कभी बंदूक के लिए जेल जाना भी था मंजूर
शाहजहांपुर में पकड़ा गया था फर्जी लाइसेंस बनाने वाला गिरोह
एक जमाना था, जब लोग बंदूक खरीदने के लिए जमीन तक बेच देते थे। बंदूक रखने का शौक इस कदर सिर चढ़कर बोलता था कि 2014 में शाहजहांपुर में फर्जी शस्त्र लाइसेंस जारी करने वाला गिरोह पकड़ा गया था जो डीएम कार्यालय की नाक के नीचे फर्जी लाइसेंस बनाता था। इस गिरोह के बनाए सौ से ज्यादा फर्जी लाइसेंस पकड़े गए थे और यह कार्रवाई कई साल तक चली थी। इससे पहले शाहजहांपुर में ही सैकड़ों की तादाद नगालैंड के बने शस्त्र लाइसेंस भी पकड़े गए थे। ज्यादातर लोगों ने फर्जी लाइसेंस पर बंदूकें ही खरीदी थीं। प्रदेश के कई और जिलों में भी फर्जी शस्त्र लाइसेंस पकड़े जा चुके हैं।
मेरी दुकान में ढाई सौ से तीन सौ ऐसी बंदूकें जमा हैं, जो बरसों पहले लोग जमा कर गए फिर लौटकर नहीं आए। सौ से ज्यादा बंदूके 15-20 साल से रखे हैं। डेढ़ सौ से ज्यादा बंदूकें लाइसेंस धारकों से खरीद ली थीं। वे भी पड़ी हैं। हम तो पांच सौ रुपये में भी बंदूक देने को तैयार हैं, कोई आए तो सही। दूसरी दुकानों का यही हाल है - गुरजीत सिंह बिंद्रा, अध्यक्ष शस्त्र विक्रेता समिति।
हमने सिंगल और डबल बैरल दोनों पुरानी बंदूकें खरीदनी बंद कर दी हैं। कई लोग आए, लेकिन हमने नहीं खरीदीं। दुकान में जगह ही नहीं है। नए लाइसेंस न बनने से इन बंदूकों का अब कोई लेवाल नहीं बचा है। 15-15 साल पहले बंदूकें जमा करने वाले भी लौटकर नहीं आए हैं। इन्हें सुरक्षित रखना भी हमारे लिए बड़ी समस्या है - चरन कमल सिंह, शस्त्र विक्रेता।
नए लाइसेंस न बनने से कारोबार चौपट हो गया है। मोदी जी मेक इन इंडिया के तहत देसी कंपनियों को बाजार में उतार रहे हैं, लेकिन लाइसेंस ही जारी नहीं हो रहे तो असलहे ही बनाने से क्या फायदा। 20 से 25 सालों से बंदूकें रखी हैं। किराया तक आ नहीं रहा है। संभालकर रखना हमारी मजबूरी है - हरजीत सिंह, शस्त्र विक्रेता।
बंदूक के लाइसेंस को बदलवाकर रिवॉल्वर-पिस्टल भी नहीं ले सकते
पहले बंदूक के लाइसेंस को परिवर्तित कराकर उस पर रिवॉल्वर या पिस्टल ली जा सकती थी लेकिन शस्त्र लाइसेंस पर रोक लगने के बाद यह प्रक्रिया भी बंद कर दी गई। कुछ शस्त्र विक्रेताओं के कोर्ट जाने के बाद लाइसेंस जारी करने का आदेश दिया गया। इस दरम्यान लोगाें ने बंदूक का लाइसेंस परिवर्तित कराकर रिवॉल्वर और पिस्टल लेनी शुरू कर दी। ऐसे मामले बढ़ने के बाद इस पर भी यह कहकर रोक लगा दी गई कि बंदूक के लाइसेंस को परिवर्तित करना भी नया लाइसेंस देने के बराबर है। तभी से यह पाबंदी लगी हुई है। हालांकि नियमानुसार प्रशासन बंदूक के लाइसेंस को बदलकर उस पर रिवॉल्वर लेने की अनुमति दे सकता है।
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