लोकशाही के बजाए पूंजीवादी व्यवस्था थोप रही सरकार
कृषि विधेयकों को संसद से मंजूरी मिलने के बाद से देशभर के किसान आंदोलित हैं। वह सड़कें जाम कर रहे हैं। ट्रेनें रोक रहे हैं। विरोध में अपनी फसलें भी जला रहे हैं। इन सबके बीच किसान आंदोलनों के अगुवा रहे जुझारू, खांटी समाजवादी नेता पूर्व कैबिनेट मंत्री एवं प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (लोहिया) के राष्ट्रीय …
कृषि विधेयकों को संसद से मंजूरी मिलने के बाद से देशभर के किसान आंदोलित हैं। वह सड़कें जाम कर रहे हैं। ट्रेनें रोक रहे हैं। विरोध में अपनी फसलें भी जला रहे हैं। इन सबके बीच किसान आंदोलनों के अगुवा रहे जुझारू, खांटी समाजवादी नेता पूर्व कैबिनेट मंत्री एवं प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (लोहिया) के राष्ट्रीय अध्यक्ष शिवपाल यादव से किसान आंदोलनों, नौकरशाही, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, स्वास्थ्य सेवाओं आदि मुद्दों पर अमृत विचार के वरिष्ठ संवाददाता अनुपम सिंह ने बातचीत की। पेश हैं प्रमुख अंश :
सवाल : कृषि विधेयकों के खिलाफ किसान संगठनों की ओर से किया जा रहा विरोध-प्रदर्शन कितना जायज है?
जवाब : जिस तरह से ईस्ट इंडिया कंपनी ने लोगों को गुलाम बनाया था। उसी तर्ज पर कृषि विधेयकों को सरकार लेकर आई है। इससे किसान अपनी खेत का मालिक न रहकर बल्कि मजदूर बनकर रह जाएगा। अनाज व सब्जी मंडिया खत्म हो जाएंगी। पल्लेदार, रिक्शा-ठेले वाले सब बेरोजगार हो जाएंगे। सरकार लोकशाही खत्म कर पूंजीवादी व्यवस्था लोगों पर थोप रही है।
सवाल : कोरोना की रोकथाम के लिए सरकार की ओर से उठाए कदम व स्वास्थ्य सेवाओं से कितने संतुष्ट हैं?
जवाब : जिस समय देश और प्रदेश में कोरोना के गिने चुने संक्रमित थे उस वक्त सरकार ने लाकडाउन घोषित कर दिया। अब जहां तेजी के साथ कोरोना के मरीज मिल रहे हैं तो सबकुछ खोल दिया। यह लोगों के जीवन के साथ खिलवाड़ है। कोरोना इलाज के नाम पर लूटखसोट मची हुई है। घोटाले सामने आ रहे हैं।
सवाल : रोजगार की तलाश में युवा भटक रहे हैं। सरकार की ओर से गए प्रयास आपकी नजर में सराहनीय हैं?
जवाब : सरकार की नीतियां बेरोजगारी बढ़ाने वाली हैं। जब बेरोजगार पैदा होंगे तो जाहिर है, अपराध बढ़ेगा। साढ़े तीन
वर्षों में सरकार प्रदेश में युवाओं को रोजगार देने में असफल रही है। तमाम विभागों और संस्थानों में पद खाली पड़े हैं। अगर युवा बेरोजगार होगा तो वह आंदोलन का रास्त अपनाएगा। देश में भ्रष्टाचार चरम पर है। थानों तक रेट निर्धारित हैं। सरकार का नौकरशाही पर नियंत्रण बिल्कुल नहीं रह गया है।
सवाल : जीएसटी-नोटबंदी कितनी कारगर साबित हुई है?
जवाब : जीडीपी माइनस 24 पहुंच गई। इससे ज्यादा देश की खराब अर्थव्यवस्था और क्या होगी? दुकानदारों पर जीएसटी थोप दिया गया है। अब छोटा दुकानदार जीएसटी भरने के लिए वकील को फीस दे। सीए के पास जाए। इसके बाद फिर कर चुकता करे और तो और दवाईयों पर टैक्स लिया जा रहा है। नोटबंदी से फायदा नहीं हुआ है।
सवाल : 2022 विस चुनाव में पार्टी की क्या रणनीति होगी?
जवाब : समाजवाद की विचारधारा को जीवित रखने के लिए ही प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (लोहिया) का गठन किया गया है। हम चाहते हैं, जो लोग भी समाजवादी विचाराधारा से प्रभावित हैं और वह समाज में समाजवाद की स्थापना चाहते हैं तो सभी समाजवादी मिलकर एक मंच पर आएं और 2022 में समाजवाद का परचम फहरायें।
