बाराबंकी : दम तोड़ रही दोना-पत्तल के कारीगरों की पुश्तैनी कला
हाईटेक मशीनों ने ले लिया स्थान, योजनाओं का भी नहीं मिला लाभ
रामसनेहीघाट/ बाराबंकी, अमृत विचार। आज के नए दौर में दोना-पत्तल बनाने का कार्य मशीनों पर आधारित होता जा रहा है। दम तोड़ती स्थानीय कारीगरों की पुश्तैनी कला को बेरुखी के बाजार में आज भी जीवित रखना किसी चुनौती से कम नही है लेकिन पुस्तैनी कला को छोड़े भी तो कैसे पत्तों का उपयोग कर पर्यावरण को ही बल्कि मुफलिसी के पत्तों से जीविका के वृक्ष को पुस्तैनी कला के पानी से सींचकर परिवार रुपी बाग को हरा भरा करने में लगे हैं।
तहसील मुख्यालय रामसनेहीघाट से महज 100 मीटर दूर वनराजा (वनमानुष) समुदाय परिवार के लोग निवास करते हैं। शाहपुर, मुरारपुर, कुसहरी, मरखापुर जंगल में लगे सागौन, छूल सहित अन्य चौड़े पत्तेदार पेड़ ही इन वनमानुष समुदाय के लोगों का भरण पोषण कर रहे हैं। महिलाएं पत्तों से दोना पत्तल बनाकर अपनी जीविका चला रही हैं। यहाँ पर 13 परिवार की महिलाएं और बच्चे इसी कार्य मैं लगे रहते है और आदमी पत्ते लाने और दोना पत्तल को होटलों में बेचने का कार्य करते हैं। माहूल व सागौन के पत्तों से बने दोना पत्तल की मांग बढ़ने से इसका उपयोग आसपास के गांव से लेकर शहरों तक किया जा रहा है।
रामदुलारे, अर्जुन, रामरुप, छोटकऊ, रामू, मुलायम, बड़कऊ, जसकरन, बलराम, विरेन्द्र बताते है कि हम सभी का जीवन जंगल के इन पत्तों पर आधारित है। यह काम बारिश के चार माह छोड़कर पूरे दिन होता है। इस कार्य से प्रत्येक माह एक महिला पांच से छह हजार रुपये की आमदानी प्राप्त कर रही है अैर पहले हम लोगों का अच्छी तरह से गुजर बसर हो जाता था लेकिन इन प्लाॅस्टिक और फाइबर के दोना पत्तल आ जाने से रोजी-रोटी पर लात पड़ गई है। हम लोगों का व्यवसाय अब 30 फीसदी ही बचा है। दोना पत्तल की मांग भिटरिया, देवीगंज, कोटवा सड़क,सुमेरगंज, बेल्हा चौराहा, दरियाबाद आदि कस्बों के होटलों व वैवाहिक कार्यक्रम में रहती हैं। वनराजा समुदाय के लोगों ने बताया कि सरकार द्वारा चलाई जा रही योजनाओं के लाभ से उन्हें वंचित किया गया है। हम सभी को आवासीय पट्टा, कृषि योग्य भूमि, राशन, पेंशन सहित अन्य योजनाओं का लाभ नहीं मिल रहा है। इस ओर अधिकारी न जनप्रतिनिधि किसी का ध्यान आज तक नहीं गया।
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