Unnao: ढोलक की थाप पर फाग के राग हुये गुजरे जमाने की बात; अधिकांश जगहों पर बंद हो चुकी है लोक गायन की परंपरा
उन्नाव, अमृत विचार। फैशनपरस्ती ने त्योहारों पर चलन में रहे लोकगीतों को चलन से बाहर कर दिया है। इससे शहर सहित अधिकांश गावों में भी मस्ती के त्योहार होली पर फाग गायन की परंपरा गुजरे जमाने की बात बन चुकी है।
करीब तीन दशक पहले तक सीमा विस्तार के साथ शहर का हिस्सा बनने वाले अकरमपुर व सिंगरोसी के आसपास की आबादियों में होली का डांढ़ गाड़ने के साथ ही बड़े-बुजुर्ग शाम के समय किसी स्थान पर फाग मंडली सजाते थे। यहां देर रात तक ढोलक, झांझ व मजीरों की धुनों के साथ होली से संबंधित लोक गायन करते रहते थे।
स्थानीय निवासी अधिकांश परिवार इसका हिस्सा बनते थे, लेकिन शहर का विस्तार होने के साथ ही शहरी कहलाने वाले युवाओं का रुझान कम होता चला गया। इससे अब यहां बुजुर्गों से फाग गायन की कहानियां ही सुनीं जा सकती हैं। यही नहीं जिंदगी की जद्दोजहद ने अधिकांश गांवों में भी फाग गायन की रश्म अदायगी ही की जाती है।
पहले जहां काफी पहले से फाग की स्वरलहरी गूंजना शुरू हो जाती थी। वहीं रोजी-रोजगार के लिये महानगरों के लिये हुए पलायन से भी यह परंपरा सिमटती रही। बुजुर्ग बताते हैं कि परिवारों में बटवारा होने से छोटी होती रही जोत की वजह से कृषि व्यवसाय से गृहस्थी चलाना संभव नहीं रहा।
इस लिये कोई दूसरे राज्यों में जाकर नौकरी सहित मेहनत-मजदूरी कर रहा है तो किसी ने आमदनी का जरिया बढ़ाने के लिए छोटा-बड़ा कारोबार डाल रखा है। इससे भी फाग का चलन कम होते हुये लगातार समाप्त होता जा रहा है।
लोक गायन को प्रवासी समझते हैं पिछड़ापन
अब सभी हाथों में रहने वाले मोबाइल पर जी चाहते ही फिल्मी गाने सुनते रहते हैं। वहीं दिल्ली-मुम्बई सहित अन्य बड़े शहरों से वापस गांव पहुंचने वाले लोक गायन से पिछड़ेपन महसूस होता है। इसलिए त्योहारों पर शहर से लेकर कस्बों सहित अधिकांश गांवों में फाग के बजाए डीजे या साउंड सिस्टम पर फिल्मी सहित भोजपुरी गीत सुनाई देते हैं। त्योहार मनाने गांव आने वाले लगभग सभी प्रवासी युवा पूरे दिन इयर फोन लगाकर घूमते रहेंगे, लेकिन फाग पार्टी की ओर रुख नहीं करेंगे।
