Holi 2024: अब होलिका बढ़ाने को पेड़ काटने से भय खाते युवा...सताता है जेल जाने का भय, रहती है करियर बनाने की चिंता
कानपुर में अब होलिका बढ़ाने को पेड़ काटने से भय खाते युवा
उन्नाव, अमृत विचार। शहर ही नहीं अब गावों में भी होलिका दहन के लिए लकड़ी जुटाने को युवाओं की टोलियां मशक्कत करती नहीं दिखाई देती हैं। शहर व कस्बों में जहां लकड़ी खरीदकर होलिका तैयार की जाती हैं वहीं गावों में लकड़ी के स्थान पर झाड़ियों व टहनियों से होलिका सजाई जाती हैं।
कुछ दशक पहले तक शहरी व ग्रामीण युवाओं में होलिका को बड़ा आकार देने की प्रतिस्पर्धा चलती थी। इसके लिए युवा कुल्हाड़ियां व लकड़ी काटने के अन्य संसाधन लिए आसपास के पेड़ों की डालें ही नहीं कभी-कभी पूरे पेड़ को होलिका के हवाले कर देते थे।
अब अधिकांश युवा करियर के प्रति सजगता से जहां इसमें रुचि नहीं लेते हैं। वहीं हरा पेड़ काटते हुए पकड़े जाने पर जेल जाने का भय भी बना रहता है। इसके चलते अब होलिका में ज्यादातर खरीद कर जुटाई गई लकड़ियों का ही इस्तेमाल होता है।
बोले युवा
शहर के मोतीनगर मोहल्ला निवासी पियूष चौहान ने कहा कि वह क्षेत्रीय लोगों की सुविधा के लिए होलिका दहन के लिए खरीदकर लकड़ी जुटाते हैं। स्वेच्छा से मिलने वाले सहयोग के बाद कम पड़ने पर खुद खर्च करते हैं।
यूडीए कालोनी निवासी नवीन ने कहा कि शहर में वैसे भी हरियाली का अभाव है। इसलिए इलाकाई लोग चंदा कर होलिका लिए लकड़ी मंगा लेते हैं। इसमें आसपास के लोगों का सहयोग भी प्राप्त होता है।
सरांय कटियान गांव निवासी अमित ने बताया कि पेड़ पर कुल्हाड़ी चलते ही कोतवाली पहुंचने के भय से अब लकड़ी खरीदनी पड़ती है। इसके लिये गांव के लोगों से चंदा लेना पड़ता है। जो कम भी पड़ जाता है।
चकलवंशी निवासी राजन सिंह ने कहा कि अब युवा परंपराओं के निर्वहन से अधिक करियर पर फोकस कर रहे हैं। इसलिए होलिका बढ़ाने को वे लकड़ियां काटने के बजाय लकड़ी खरीदकर होलिका बढ़ाते हैं।
