प्रयागराज :  वैवाहिक कलह से उत्पन्न आपराधिक मामले में पासपोर्ट जब्त करने का अधिकार नहीं

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Edited By Amrit Vichar
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अमृत विचार, प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आपराधिक मामले के लंबित रहने पर पासपोर्ट जब्त करने की अनिवार्यता के मामले में कहा कि पासपोर्ट अधिनियम, 1967 की धारा 10(3)(ई) स्पष्ट करती है कि अगर पासपोर्ट धारक द्वारा अपराध के संबंध में कार्यवाही भारत के किसी भी आपराधिक न्यायालय के समक्ष लंबित है। तो पासपोर्ट प्राधिकारी पासपोर्ट तथा अन्य यात्रा दस्तावेजों में बदलाव कर सकता है,उन्हें जब्त कर सकता है, या उन्हें रद्द कर सकता है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उक्त अधिनियम की धारा 3 के तहत उल्लिखित परिस्थितियों में पासपोर्ट प्राधिकारी कारण दर्ज करके पासपोर्ट जब्त कर सकता है, लेकिन यह आवश्यक नहीं है कि उक्त धारा के तहत आने वाले हर मामलों में पासपोर्ट प्राधिकारी को पासपोर्ट जब्त करना अनिवार्य हो। उक्त धारा‌ के तहत विधानमंडल ने पासपोर्ट प्राधिकरण को यह विवेक दिया है कि पूर्णतः संतुष्ट होने के बाद वह आपराधिक न्यायालय में किसी अपराध से संबंधित कार्रवाई लंबित होने के कारण ही व्यक्ति का पासपोर्ट जब्त कर सकता है, इसलिए पासपोर्ट जब्त करने का आदेश पारित करने से पहले पासपोर्ट प्राधिकारी को प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार करने के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए कारण दर्ज करने होंगे। आपराधिक न्यायालय में लंबित आपराधिक कार्यवाही के कारण पासपोर्ट धारक न्यायालय के समक्ष उपस्थिति से बचने के लिए पासपोर्ट का दुरुपयोग कर सकता है और कार्यवाही समापन में देरी कर सकता है।

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि केवल आपराधिक मामले का लंबित होना पासपोर्ट जप्त या रद्द करने के लिए पर्याप्त नहीं है ऐसा करने के लिए कारण दर्ज किए जाने चाहिए। अंत में कोर्ट ने माना कि याची के खिलाफ दाखिल आपराधिक मामला वैवाहिक कलह से उत्पन्न हुआ था और हाईकोर्ट से इस पर रोक लगाने की मांग की गई थी। अत: याची के पासपोर्ट को जब्त करने के आदेश को रद्द करते हुए न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने मोहम्मद उमर की याचिका को स्वीकार कर लिया।

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