अब कोई बहाना नहीं

Amrit Vichar Network
Published By Vishal Singh
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महिलाओं व लड़कियों के विरुद्ध हिंसा एक वैश्विक संकट के रूप में बरकरार है। लैंगिक वजहों से महिलाओं व लड़कियों को जान से मार दिए जाने की घटनाएं, सीमाओं, सामाजिक आर्थिक स्थितियों और संस्कृतियों से परे हैं।

कहा जा सकता है लिंग आधारित हिंसा के व्यापक आंकड़े चिंताजनक हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के मुताबिक दुनियाभर में एक तिहाई महिलाएं अपने जीवनकाल में कम से कम एक बार हिंसा का अनुभव करती हैं। वास्तव में महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ हिंसा की महामारी, मानवता को शर्मसार करती है। वर्ष 2023 में हर दिन 140 महिलाएं व लड़कियां अपने साथी या करीबी रिश्तेदार के हाथों मौत का शिकार हुई हैं।

महिलाओं को जान से मारने की इस भयावह वास्तविकता का खुलासा महिला सशक्तिकरण के लिए काम कर रही संयुक्त राष्ट्र की संस्था की एक रिपोर्ट से हुआ है। रिपोर्ट महिलाओं के खिलाफ हिंसा के उन्मूलन के लिए अंतर्राष्ट्रीय दिवस की 25 वीं वर्षगांठ के मौके पर आई है। यह रिपोर्ट 10 दिसंबर तक चलने वाले 16 दिनों के वार्षिक सक्रियता अभियान के शुरू में जारी की गई।

भारत में भी सोमवार को लिंग आधारित हिंसा को समाप्त करने के लिए ‘अब कोई बहाना नहीं’ अभियान शुरू किया गया। अभियान संयुक्त राष्ट्र महिला के समर्थन से महिला एवं बाल विकास और ग्रामीण विकास मंत्रालयों के बीच एक सहयोगात्मक प्रयास है। 
महिला एवं बाल विकास मंत्री अन्नपूर्णा देवी ने कहा कि अभियान का उद्देश्य महिलाओं को सशक्त बनाना, उन्हें अपनी गरिमा के लिए लड़ने में सक्षम बनाना है।

लिंग आधारित हिंसा महिलाओं और लड़कियों को सम्मान के साथ जीने और विकास प्रक्रिया में समान भागीदार के रूप में योगदान करने से रोकती है। यदि महिलाओं को पूर्ण रूप से सशक्त बनाना है, तो महिला सशक्तिकरण, सामाजिक सशक्तिकरण, राजनीतिक सशक्तिकरण और शैक्षणिक सशक्तिकरण करना होगा।

हालांकि दुनियाभर में महिलाओं के खिलाफ लिंग आधारित हिंसा की प्रकृति और प्रभाव के बारे में जागरूकता बढ़ रही है। महिलाओं के अधिकारों को बढ़ावा देने, महिलाओं को हिंसा से बचाने और उनकी सुरक्षा के लिए व्यापक कानूनी ढांचे, विशिष्ट संस्थान और नीतियां बनाई गई हैं। फिर भी महिलाओं की न्याय तक पहुंच में अभी भी बाधाएं हैं।

यानी मजबूत कानून, बेहतर डेटा संग्रहण, अधिक सरकारी जवाबदेही, शून्य सहिष्णुता संस्कृति और महिला अधिकार संगठनों एवं संस्थागत निकायों के लिए वित्त पोषण में वृद्धि करके हिंसा मुक्त जीवन के अधिकार की प्राप्ति सुनिश्चित करने के लिए अभी भी काफी प्रयासों की आवश्यकता है। महिलाओं के विरुद्ध भेदभावपूर्ण रवैयों में बदलाव लाने और हिंसा की रोकथाम के लिए सक्रियता से कदम उठाने होंगे।