संपादकीय: ऊर्जा संकट के संकेत
ईरान के दावे और अमेरिका तथा इसराइल के बयानों से लगता है कि पूरे पश्चिम एशिया में फैल चुकी यह जंग लंबी खिंच सकती है। यह टकराव कुछ सप्ताह से आगे बढ़ता है, तो भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देश के लिए आर्थिक और सामाजिक प्रभाव गंभीर हो सकते हैं। हमारी ऊर्जा जरूरतों का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल बाहर से और उसका बड़ा हिस्सा खाड़ी क्षेत्र से बरास्ता स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के जरिए प्रतिदिन आता है। इसके बाधित होने से तेल आपूर्ति व कीमत दोनों पर गंभीर दबाव पड़ेगा।
भारत के पास विशुद्ध रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार लगभग 10 दिन के आयात के बराबर है, जबकि सार्वजनिक और निजी कंपनियों के पास वाणिज्यिक स्टॉक मिलाकर कुल भंडार लगभग 70 दिन तक माना जाता है। यही कारण है कि आधिकारिक और अनौपचारिक आंकड़ों में अंतर दिखाई देता है। युद्ध तीन सप्ताह से अधिक खिंचने और होर्मुज जलमार्ग बाधित होने से कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर जाने की आशंका गलत नहीं है।
इससे भारत का आयात बिल और चालू खाते का घाटा बढ़ेगा, तो रुपये पर दबाव पड़ेगा। ईंधन महंगा होगा तो परिवहन लागत बढ़ेगी। फलत: खाद्य वस्तुओं से लेकर रोजमर्रा की सेवाओं तक कीमतें बढ़ जाएंगी। थोड़ी राहत उन जहाजों से मिल सकती है, जो पहले ही होर्मुज पार कर चुके हैं या रूसी तेल लेकर समुद्र में खड़े हैं। ये कुछ दिनों या हफ्तों की आपूर्ति बनाए रखने में मदद कर सकते हैं, लेकिन दीर्घकालिक समाधान नहीं हैं। ऐसे में भारत को वैकल्पिक स्रोतों की ओर देखना होगा। पश्चिम अफ्रीका-विशेषकर नाइजीरिया और अंगोला तथा दक्षिण अमेरिकी देशों से तेल आयात एक विकल्प हो सकता है, हालांकि इन स्रोतों से तेल लाने की दूरी अधिक होने से परिवहन लागत बढ़ेगी।
अमेरिकी दबाव के बावजूद, यदि वैश्विक संकट गहराता है तो भारत को रूस से तेल खरीद कर अपनी ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता देनी होगी। प्राकृतिक गैस के क्षेत्र में भी जोखिम कम नहीं है। खाड़ी क्षेत्र से एलएनजी आपूर्ति बाधित होने की आशंका और कतर के ऊर्जा प्रतिष्ठानों पर हमले की खबरें चिंता बढ़ाती हैं। यदि आयातित गैस की आपूर्ति प्रभावित होती है, तो पीएनजी और सीएनजी की उपलब्धता पर असर पड़ सकता है। ऐसे में घरेलू उत्पादन बढ़ाने, एलएनजी के वैकल्पिक अनुबंध करने और उद्योगों को प्राथमिकता-आधारित वितरण नीति अपनाने की आवश्यकता पड़ सकती है।
आपूर्ति स्रोतों का विविधीकरण, अतिरिक्त एलएनजी कार्गो की व्यवस्था और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को भंडार बनाए रखने के निर्देश इसके संकेत हैं। सरकार बाजार की अस्थिरता के बावजूद उपभोक्ताओं को राहत देने की हर संभव कोशिश करेगी। वह रिफाइनरियों से पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात पर अस्थायी नियंत्रण लगा सकती है, ताकि घरेलू आपूर्ति सुनिश्चित रहे। व्यापार मार्गों में बदलाव और रणनीतिक भंडार का नियंत्रित उपयोग भी विकल्प हो सकते हैं। इस आसन्न संकट ने याद दिलाया है कि ऊर्जा सुरक्षा के लिए मात्र आयात पर निर्भरता तज कर देश की अर्थव्यवस्था के दीर्घकालिक समाधान के रूप में नवीकरणीय ऊर्जा, घरेलू गैस उत्पादन और रणनीतिक भंडार क्षमता बढ़ाने की दिशा में तेज़ कदम तत्काल उठाने होंगे।
