संपादकीय: संतुलित कूटनीति ही सही

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Published By Monis Khan
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भारत से लौटते ईरानी युद्धपोत को अमेरिका द्वारा लंका के निकट हिंद महासागर में मार गिराना हो या ईरान द्वारा कथित रूप से अल्बानिया पर हमला, ऐसी खबरों ने यह आशंका गहरी कर दी है कि यह संघर्ष क्षेत्रीय नहीं, बल्कि वैश्विक संकट बन सकता है। जब किसी क्षेत्रीय संघर्ष में बड़ी शक्तियां प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से शामिल हो जाती हैं, तो उसका दायरा तेजी से बढ़ने लगता है। ईरान और अमेरिका के बीच बढ‌ता सैन्य टकराव वैश्विक ऊर्जा बाजार, समुद्री व्यापार मार्गों और अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रभावित करेगा। 

अमेरिकी राजनीति में लंबे समय से यह धारणा रही है कि ईरान की वर्तमान इस्लामी व्यवस्था उसके हितों के अनुकूल नहीं है। डोनाल्ड ट्रंप जैसे नेताओं ने कई बार ईरान की मौजूदा सत्ता को बदलने की अप्रत्यक्ष इच्छा व्यक्त की है। पर वे किस तरह का बदलाव चाहते हैं?  क्या ट्रंप की मंशा है कि वह वेनेजुएला की तरह ईरान का सत्ता प्रमुख स्वयं चुनें और फिर ईरान की व्यवस्था अमेरिका या उनके मुताबिक चले? 

किसी भी संप्रभु देश की सरकार का निर्धारण बाहरी शक्तियों द्वारा किया जाना अंतर्राष्ट्रीय कानून और लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध है। ट्रंप को ईरान के सर्वोच्च पद पर खामेनेई का बेटा इसलिए स्वीकार्य नहीं है, क्योंकि इससे ईरान की मौजूदा व्यवस्था और अधिक मजबूत हो सकती है। अमेरिका संभवतः ऐसी नेतृत्व संरचना चाहता है, जो उसकी नीतियों के प्रति पूर्णतया अनुकूल हो। परंतु सवाल है कि ईरान के नेतृत्व का निर्णय कौन करेगा, ईरानी जनता और उसकी राजनीतिक व्यवस्था या ट्रंप? 

अंतर्राष्ट्रीय जलक्षेत्र में ईरान के एक जहाज पर अमेरिकी हमले की खबर चिंताजनक है। सामान्यतः ऐसी सैन्य कार्रवाई से पहले संबंधित देशों को चेतावनी दी जाती है, विशेषकर तब जब वह जहाज किसी तीसरे देश के बंदरगाह से होकर गुजर रहा हो। भारत का अतिथि रहकर वापस जा रहे जहाज पर हमले के बाद अपेक्षित था कि इस घटना पर संवेदना और चिंता व्यक्त की जाती। भारत जैसे जिम्मेदार देश के लिए यह संतुलन साधना कठिन अवश्य है, परंतु मानवीय दृष्टि से प्रतिक्रिया अपेक्षित होती है। 

जहां तक अमेरिका-इसराइल और ईरान के बीच संघर्ष की दिशा का प्रश्न है, फिलहाल यह एक सीमित, लेकिन तीव्र टकराव की ओर बढ़ता दिख रहा है। दोनों पक्ष प्रत्यक्ष युद्ध से बचने की कोशिश करते हुए भी एक-दूसरे पर दबाव बनाने की रणनीति अपना रहे हैं, यदि यह संतुलन टूटता है तो परिणाम गंभीर हो सकते हैं। परंपरागत रूप से संवाद, कूटनीति और शांतिपूर्ण समाधान के समर्थक भारत ने पश्चिम एशिया में संघर्ष के शीघ्र अंत का आह्वान किया है। फिलहाल भारत के लिए इस स्थिति में सबसे उपयुक्त नीति संतुलित कूटनीति की है। भारत के संबंध अमेरिका, इसराइल और ईरान तीनों से महत्वपूर्ण हैं। 

ऊर्जा सुरक्षा, भारतीय प्रवासी समुदाय और व्यापारिक हितों को देखते हुए भारत को किसी पक्ष में खुलकर खड़े होने के बजाय शांति और संवाद का समर्थक बनकर रहना होगा। साथ ही वैश्विक मंचों पर अंतर्राष्ट्रीय कानून और संप्रभुता के सिद्धांतों की रक्षा की आवाज उठानी होगी। राष्ट्रीय हितों और वैश्विक स्थिरता दोनों के लिए यही नीति सर्वाधिक उपयुक्त है।