श्रमिक के हलफनामे पर ही नहीं हो सकता फैसला, हाईकोर्ट ने श्रम न्यायालयों को दिया निर्देश

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प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक मामले में श्रम न्यायालयों को निर्देश दिया है कि किसी मामले में केवल श्रमिक के लिखित बयान या हलफनामे के आधार पर एकतरफा फैसला नहीं सुनाया जा सकता। न्यायिक विवेक का प्रयोग करते हुए साक्ष्यों की जांच जरूरी है, भले ही नियोक्ता ने बयान का खंडन न किया हो। कारण न बताना न्याय से इनकार करने के समान है। केवल तथ्यों का उल्लेख कर बर्खास्तगी को अवैध बताना, निर्णय को अस्थिर और अवैध बना देता है।

उक्त आदेश न्यायमूर्ति प्रकाश पाडिया की एकलपीठ ने मेसर्स ओमराव इंडस्ट्रियल कॉर्पोरेशन प्राइवेट लिमिटेड की याचिका को स्वीकार करते हुए पारित किया। कोर्ट ने अपने आदेश में आगे कहा कि उत्तर प्रदेश औद्योगिक विवाद नियमावली, 1957 के नियम 12(9) में यह प्रावधान है कि यदि श्रमिक के लिखित बयान का खंडन नियोक्ता द्वारा नहीं किया जाता तो उसे सही माना जाएगा, लेकिन इसका यह अर्थ  नहीं है कि बिना किसी दस्तावेजी या मौखिक साक्ष्य के ही कर्मचारी के दावों को पूर्णतः स्वीकार कर लिया जाए।

मामले के अनुसार कंपनी के विरुद्ध श्रमिक ने श्रम न्यायालय में कार्यवाही शुरू की थी, जिसमें श्रम न्यायालय, कानपुर ने नियोक्ता की अनुपस्थिति में एकतरफा आदेश पारित कर दिया। कंपनी ने आदेश रद्द करने की अर्जी दी, जो खारिज हो गई। इसके बाद कंपनी ने हाईकोर्ट के समक्ष उक्त आदेश को चुनौती दी। कंपनी के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि श्रम न्यायालय ने न तो किसी गवाह को बुलाया और न ही साक्ष्यों पर विचार किया, जिससे निर्णय तर्कहीन और न्यायसंगत मालूम होता है।

अंत में कोर्ट ने माना कि श्रम कानून कल्याणकारी कानून हैं, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि साक्ष्य स्वीकार करने की प्रक्रिया ही दरकिनार कर दी जाए।अतः कोर्ट ने श्रम न्यायालय का निर्णय रद्द करते हुए मामले को पुनः सुनवाई के लिए वापस भेज दिया, साथ ही कंपनी को कर्मचारी लालजी प्रसाद वाजपेयी को पाँच हजार रुपये देने का निर्देश दिया।

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