'वसीके' की जायज रकम के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाएंगे हुक्मरान-ए-अवध के वंशज, पढ़ें पूरी खबर
लखनऊ: अवध के शाही खानदान के वंशजों को मिलने वाली 'वसीके' की राशि अब इतनी मामूली हो चुकी है कि वे इसके लिए अदालत का रुख करने को मजबूर हैं। नवाब शाहिद अली खां, जो अवध के तीसरे बादशाह मुहम्मद अली शाह के वजीर रफीकउद्दौला बहादुर के परपोते हैं, को हर तिमाही में मात्र 4 रुपये 19 पैसे और नवाब आसिफउद्दौला की मां बहू बेगम के वसीके के रूप में सालाना 3 रुपये 21 पैसे मिलते हैं। यह राशि भले ही उनके शाही वंश से जुड़े होने का प्रतीक हो, लेकिन यह उनके लिए एक कड़वा सच भी है।
वसीका, वह ब्याज है जो अवध के शासकों और उनके वफादारों के वंशजों को उस कर्ज के बदले मिलता है, जो ईस्ट इंडिया कंपनी को उनके पूर्वजों ने दिया था। वसीका विभाग के एक अधिकारी के मुताबिक, वर्तमान में करीब 900 वंशजों को यह राशि दी जाती है, जो हर महीने औसतन 22,000 रुपये के आसपास होती है और इसे सभी वंशजों में बांटा जाता है।
'रॉयल फैमिली ऑफ अवध' के महासचिव शिकोह आजाद, जो मुहम्मद अली शाह के वंशज हैं, को प्रतिमाह केवल 281 रुपये 45 पैसे मिलते हैं। वे कहते हैं कि यह राशि उनके शाही खानदान की पहचान तो है, लेकिन आज के महंगाई के दौर में यह नाकाफी है। आजाद के अनुसार, आजादी से पहले वसीके की राशि चांदी के सिक्कों में दी जाती थी, लेकिन 1947 में सत्ता हस्तांतरण के बाद नेहरू सरकार ने चांदी की जगह गिलट के सिक्कों का चलन शुरू किया, जिससे वंशजों के साथ अन्याय शुरू हुआ। जैसे-जैसे पीढ़ियां बढ़ीं, वंशजों की संख्या बढ़ने से यह राशि और कम होती गई।
नवाब शाहिद अली खां ने बताया कि बहू बेगम ने ईस्ट इंडिया कंपनी को अपने समय में लगभग 4 करोड़ रुपये के बराबर कर्ज दिया था, और मुहम्मद अली शाह ने 1839 में 12 लाख रुपये का कर्ज दिया था। इन दोनों की वसीयत के अनुसार, इस कर्ज के ब्याज को उनके वंशजों और वफादारों में बांटा जाना था।
वसीके की राशि बढ़ाने के लिए 'रॉयल फैमिली ऑफ अवध' ने जून 2015 में तत्कालीन गृह मंत्री राजनाथ सिंह से मुलाकात की थी, जिसके बाद एक समिति बनाई गई थी, लेकिन उसकी रिपोर्ट अभी तक नहीं आई। अब संगठन इलाहाबाद उच्च न्यायालय में याचिका दाखिल करने की तैयारी कर रहा है, जो संभवतः जनवरी 2026 में दायर होगी। याचिका में मांग की जाएगी कि वसीके की राशि को 1947 से पहले की तरह चांदी के सिक्कों के मूल्य के बराबर किया जाए या वर्तमान ब्याज दर (लगभग 9%) के हिसाब से भुगतान किया जाए।
आजाद ने कहा कि अगर भारत की अदालतों से न्याय नहीं मिला, तो वे अंतरराष्ट्रीय न्यायालय का रुख करेंगे, जिसमें ब्रिटेन उच्चायोग को भी पक्षकार बनाया जाएगा, क्योंकि कर्ज ईस्ट इंडिया कंपनी को दिया गया था। उन्होंने बताया कि सत्ता हस्तांतरण के समय अंग्रेज सरकार और नेहरू सरकार के बीच हुए समझौते में 4% ब्याज दर तय की गई थी, जो आज भी लागू है, जबकि वर्तमान में ब्याज दर 9% के आसपास है।
वसीका विभाग के अधिकारी ने बताया कि वंशजों की बढ़ती संख्या के कारण राशि कम होती गई। पहले कम वंशज होने से प्रति व्यक्ति अधिक राशि मिलती थी, लेकिन अब यह राशि विभाजित होकर नगण्य रह गई है। आजाद ने बताया कि वसीके का 95% हिस्सा मुख्य रूप से बहू बेगम, मुहम्मद अली शाह और शुजाउद्दौला के वंशजों को मिलता है, जबकि 5% उनके वजीरों और खिदमतगारों के वंशजों को।
वसीके का इतिहास बताते हुए आजाद ने कहा कि ईस्ट इंडिया कंपनी को अवध के शासकों ने अपने कारोबार के लिए कर्ज दिया था। उस समय यह तय हुआ था कि इस कर्ज के ब्याज को उनके वंशजों में हमेशा बांटा जाएगा। अब वंशज इस राशि को न्यायसंगत बनाने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ने को तैयार हैं।
