प्रयागराज : सार्वजनिक उपयोग की भूमि के चकबंदी मामलों में राज्य आवश्यक पक्ष

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Edited By Amrit Vichar
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प्रयागराज, अमृत विचार : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सार्वजनिक उपयोग की भूमि से जुड़े चकबंदी मामले की सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि ग्रामसभा की भूमि व संपत्तियों से जुड़े चकबंदी मामलों में राज्य सरकार को अनिवार्य रूप से पक्षकार बनाया जाए, विशेषकर तब जब विवादित भूमि ‘सार्वजनिक उपयोगिता’ (जैसे श्मशान भूमि) की श्रेणी में आती हो। यह आदेश उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता, 2006 की धारा 213 एवं नियम 74(एफ) के परिशिष्ट II का हवाला देते हुए न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की एकलपीठ ने दिया। कोर्ट ने डीडीसी का आदेश रद्द करते हुए मामले को पुनर्विचार हेतु वापस भेजा और निर्देश दिया कि राज्य को आवश्यक पक्षकार बनाकर दो माह में निर्णय लिया जाए। कोर्ट ने यह भी कहा कि पुनरीक्षण न्यायालय अधिकार क्षेत्र और धोखाधड़ी के दावे पर विचार करे, साथ ही ग्राम प्रधानों द्वारा मनमाने ढंग से मुकदमे वापस लेने पर चिंता जताई।

रवेंद्र सिंह की याचिका स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट ने निश्चित किया कि न्यायिक आदेशों की अंतिमता और सार्वजनिक उपयोगिता वाली भूमि के संबंध में राज्य के हितों की सुरक्षा सुनिश्चित की जानी चाहिए। मामले के अनुसार ग्राम अमोखरी, तहसील सासनी, जिला हाथरस में 1996 में चकबंदी प्रक्रिया के दौरान 0.520 हेक्टेयर भूमि याची के हिस्से में आवंटित की गई थी। यह आवंटन 1999 में अपील और 2010 में पुनरीक्षण में भी कायम रहा, लेकिन 2025 में नव निर्वाचित ग्राम प्रधान ने दावा किया कि यह भूमि श्मशान भूमि थी और पूर्व चकबंदी से ग्रामसभा को नुकसान हुआ। इस आधार पर उप निदेशक, चकबंदी (डीडीसी) ने 9 मई 2025 को 2010 के आदेश को निरस्त कर दिया। कोर्ट ने पाया कि राज्य को पक्षकार बनाए बिना आदेश पारित किया गया था, जो उचित नहीं है। कोर्ट ने कहा कि ग्रामसभा मात्र संरक्षक है, असली मालिक राज्य है, इसलिए ऐसे मामलों में राज्य की भागीदारी ज़रूरी है जिससे सरकारी हितों व न्यायिक स्थिरता की रक्षा हो सके। अतः कोर्ट ने डीडीसी का आदेश रद्द कर दिया।

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