कहानी ‘किस्सागोई’ की
पूरी दुनिया में किस्सागोई फिर से पॉपुलर हो रही है। विश्व में किस्सागोई अलग-अलग फार्मेट में हजारों साल पहले से मौजूद है। अपने देश भारत में चौपाल और चौबारों में किस्सागोई का खूब ट्रेंड था। सर्दियों में अलाव के किनारे देर रात तक किस्से कहे और सुने जाते थे। साथ में अलाव में भुने आलू और गंजी (रतालू) अलग ही मजा देती थी। इसे आर्ट फार्म में दुनियाभर में मकबूल करने का श्रेय ईरान को जाता है। ईरान ने इसे एक नया रूप और अंदाज दिया। ईरान के किस्सागो मुगलों के जमाने में भारत आए। यह दरबार में बादशाहों को अपने दिलचस्प अंदाज में किस्सा सुनाया करते थे। इस तरह यह परंपरा बादशाहों के दरबारों से लेकर आम घरों तक फैली। पिछले दिनों बरेली में किताब उत्सव का आयोजन किया गया। इसमें लखनऊ के किस्सागो हिमांशु वाजपेयी भी आए। इस मौके पर उनसे किस्सागोई पर औपचारिक बातचीत हुई। - कुमार रहमान,
क्या होती है किस्सागोई
‘किस्सा’ का अर्थ है कहानी और ‘गोई’ का मतलब होता है कहना। इस तरह किस्सागोई का मतलब ‘कहानी कहना’ है। यह तो हुआ शाब्दिक अर्थ, लेकिन सिर्फ कहानी कह देना ही किस्सागोई नहीं है। कहानी को एक खास अंदाज में कहना या सुनाना ही किस्सागोई है। इसमें रवानी के साथ बयानी बहुत अहम तत्व है। साथ ही सुनाने का अंदाज ऐसा हो, जिसमें कल्पना, कौतूहल और नाटकीयता का भरपूर समावेश भी होना चाहिए। अगर यह सारे तत्व नहीं होंगे, तो वह महज सपाटबयानी ही कहलाएगी और सुनने वाले को जरा भी मजा नहीं आएगा।
भारत में कहानियां
बतकही के तौर पर भारत में कहानी सुनाने का इतिहास पुराना है। हिमांशु कहते हैं, “भारत कहानियों की पुरानी पीठ है। गुणाढ्य ने ‘बृहत्कथा’ लिखी थी। इस महाकाव्य में कहानी कही गई है। बाद में सोमदेव ने ‘कथा सरित सागर’ नाम से एक रचना की। इस किताब में सैकड़ों की तादाद में कहानियां हैं।” हिमांशु की मानें तो ‘अलिफ लैला’ या ‘अरेबियन नाइट्स’ की कहानियां ‘कथा सरित सागर’ से ही प्रेरित हैं।
किस्सागोई और ईरान
किस्सागोई दुनियाभर में ईरान से पहुंची। ईरान ने इसे क्लासिकी में ढाला और इसे कलात्मक अंदाज में पेश किया। अमीर हमजा की कहानियां फारसी से उर्दू में आईं, जिन्हें किस्सागोई के तौर पर पेश किया जाने लगा। इसी तरह से बागो-बहार उर्फ किस्सा चहार दरवेश भी अपने जमाने में किस्सागोई के तौर पर बहुत लोकप्रिय रहीं।
लखनऊ के आखिरी दास्तानगो
हिमांशु वाजपेयी जैसे लोग लखनऊ में फिर से किस्सागोई को लोकप्रिय बनाने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि लखनऊ के आखिरी किस्सागो मीर बाकर अली थे। वह बड़े खास अंदाज में कहानियां सुनाया करते थे। लोग पैसे देकर, उनसे किस्सा सुना करते थे। बाद में मनोरंजन के दूसरे साधन आ गए, तो यह फार्मेट धीरे-धीरे खत्म होने लगा। हिमांशु ने बताया कि बाद में बाकर अली को काम मिलना भी बंद हो गया। बाद के दिनों में वह गुजर-बसर के लिए छालियां (पान की डली) बेचा करते थे।
किस्सागोई और दास्तानगोई में फर्क
बातचीत में हिमांशु वाजपेयी बताते हैं कि किस्सागोई और दास्तानगोई में फर्क होता है। किस्सागोई में छोटी कहानी होती है, जबकि दास्तानगोई में लंबी कहानी होती है। यानी इसमें कई छोटी-बड़ी घटनाओं का समावेश होता है। इन तमाम घटनाओं को नाटकीय तरीके से इस तरह से पेश किया जाता है कि सुनने वाले को भरपूर मजा मिल सके।
अमीर खुसरो पहले दास्तानगो
दुनियाभर में लिखावट से पहले सुन और याद करके ही तमाम ज्ञान और कहानियां एक-पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचती रही हैं। गांव-रांव में चौपालों-चौबारों और खेत-खलिहानों में बैठकी के दौरान मजेदार अंदाज में कहानी सुनाने का इतिहास बहुत पुराना है। हिमांशु ने बताया कि भारत के पहले दास्तानगो अमीर खुसरो थे। उन्हें हजरत निजामुद्दीन औलिया को दास्तान सुनाई थी। इस तरह से इसके आर्ट फार्म की शुरुआत हुई।
यूथ में साहिर सबसे ज्यादा पॉपुलर
हिमांशु देश के तमाम हिस्सों में किस्सागोई के लिए जाते हैं। एक सवाल पर उन्होंने बताया कि वह ज्यादातर फ्रीडम फाइटर या आजादी की जंग पर किस्से सुनाते हैं। उनका मकसद है नई पीढ़ी को क्रांतिकारियों और आजादी की लड़ाई से परिचित करना। इसके अलावा वह हिंदी और उर्दू के लेखकों के बारे में भी किस्से सुनाते हैं। मजाज लखनवी पर भी वह किस्सागोई करते हैं। वह कहते हैं कि युवाओं के बीच में साहिर लुधियानवी के किस्से खासा मकबूल हैं।
