मदरसा बोर्ड में दो दशक से चल रहे जालसाजों के गिरोह... डिजिटाइजेशन के आदेश को भी कर दिया दरकिनार

Amrit Vichar Network
Edited By Muskan Dixit
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फर्जी अंकपत्र बनवा कई बने मदरसों के प्रधानाचार्य। शमशुद हुदा खान के खिलाफ कार्रवाई के बाद हरकत में आया मदरसा बोर्ड।

लखनऊ, अमृत विचार: मदरसा शिक्षा परिषद में करीब दो दशक से फर्जी अंक पत्र बनवाने वाले गिरोह का बोलबाला है। इस गिरोह पर शिकंजा कसने की तैयारी 2015 में हुई थी। हालात यह थे कि पुराने रिकार्ड से छेड़छाड़ कर कई ने फर्जी अंक पत्र बनवाया। इसके बाद कई मदरसों में बतौर प्रधानाचार्य कार्यरत हैं। नई पहल ने गिरोह के नेटवर्क ने ध्वस्त कर दिया। हाल में ही एटीएस द्वारा ब्रिटेन नागरिक बनकर मदरसा शिक्षक शमशुल हुदा खान ने लाखों रुपये वेतन हासिल कर लिया। इसका खुलासा होने और शासन के निर्देश पर मदरसा बोर्ड ने दोबारा फर्जीवाड़ा करने वाले गिरोह पर शिकंजा कसने की तैयारी कर दिया है। बोर्ड के अधिकारियों के इस पहल से गिरोह में शामिल कर्मचारियों में खलबली मच गई है।

मदरसा बोर्ड में फर्जी मार्कशीट, टेबुलेशन रजिस्टर में कूटरचना और कंप्यूटर डेटाबेस में छेड़छाड़ से जुड़े आरोप पिछले कई वर्षों से उठते रहे हैं। वर्ष 2015-16 में तत्कालीन रजिस्ट्रार द्वारा तकनीकी सुधारों की शुरुआत की गई थी, लेकिन बाद में प्रक्रिया फिर पुराने ढर्रे पर लौट आई। बोर्ड में वर्षों से तैनात कुछ कर्मचारियों पर दलालों के माध्यम से अभ्यर्थियों से मोटी राशि लेकर फर्जी मार्कशीट उपलब्ध कराने के आरोप लगते रहे हैं। नेटवर्क में डेटा एंट्री करने वाले कुछ कंप्यूटर ऑपरेटरों की भूमिका भी सामने आ रही है। पूर्व में दो रजिस्ट्रारों के निलंबन, विजिलेंस जांचों और मंडलायुक्त स्तर तक मामलों के पहुंचने के बाद भी कोई कार्रवाई नहीं हो सकी। कुशीनगर और प्रयागराज से जुड़े कुछ मामलों में विरोधाभासी रिपोर्ट और लंबी जांच प्रक्रियाओं ने भी शासन को सोचने पर मजबूर कर दिया।

कर्मचारियों की अचानक पदोन्नति से गहराया संदेह

शाहजहांपुर, बरेली और आगरा के राज्यानुदानित मदरसों में तैनात रहे कुछ कंप्यूटर ऑपरेटरों की अचानक पदोन्नति कर दिया। इससे विभागीय अधिकारियों व कर्मचारियों के सांठगांठ की चर्चा को बल मिलने लगा। इसे अंकपत्र नेटवर्क से जोड़कर देखा जा रहा है। कुछ महीनों में परिषद के उपाध्यक्ष एवं निदेशक, अल्पसंख्यक कल्याण अंकित अग्रवाल द्वारा अभिलेखों के डिजिटाइजेशन की पहल तेज की गई है। इसके बाद परिषद के भीतर कथित नेटवर्क के सक्रिय होने और पुराने मामलों को निपटाने की जल्दबाजी की चर्चा है।

सिर्फ एक वर्ष के अंकपत्र ही हो सकेंगे संशोधित

रजिस्ट्रार द्वारा जारी आदेश ने स्थिति को और स्पष्ट कर दिया है। नए प्रावधान के तहत मार्कशीट में संशोधन केवल एक वर्ष के भीतर ही स्वीकार किए जाएंगे। द्वितीय प्रति किसी भी समय उपलब्ध होगी। 

पासपोर्ट सत्यापन प्रक्रिया को पूरी तरह ऑनलाइन कर दिया गया है, जिससे बाबुओं और एजेंटों की कथित मनमानी पर रोक लग सके। डिजिटाइजेशन और नई नीति के बाद कथित नेटवर्क पर रोक लग सके। सूत्रों की माने तो फर्जी मार्कशीट के लिए लिया गया “बयाना” लौटाने, कई मोबाइल नंबर बंद करने और लंबित मार्कशीट मामलों को अचानक वापस लेने जैसी स्थितियां सामने आ रही हैं।

 

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