मेरा शहर मेरी प्रेरणा : मंजुल जोशी बवालियों को नाम से बुलाकर कर देते थे शर्मशार
सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील हो चले बरेली शहर में लंबे समय तक या यूं कहें कि रिकॉर्ड समय तक एडीएम सिटी रहने वाले मंजुल कुमार जोशी शहर के लोगों के दिलों में आज भी बसते हैं। सिटी मजिस्ट्रेट फिर एडीएम सिटी के दो कार्यकाल पूरे करने वाले मंजुल कुमार जोशी उत्तराखंड राज्य बनने पर वहां भेज दिए गए थे। उत्तराखंड में आईएएस कैडर से सेवानिवृत्त होने वाले मंजुल कुमार जोशी इन दिनों हल्द्वानी में रहते हैं, लेकिन बरेली लगातार उनके दिलों में बसता है।
मंजुल कुमार जोशी की खासियत यह रही है कि वह बरेली शहर के चप्पे-चप्पे से ही वाकिफ नहीं थे, बल्कि यहां रहने वाले लोगों को भी व्यक्तिगत रूप से जुड़े हुए थे। बरेली शुरू से ही संवेदनशील शहर था और आए दिन दोनों समुदायों के लोग आमने-सामने आ जाते थे, लेकिन जब मंजुल जोशी उनके बीच में आ जाते तो दो दोनों पक्ष शांत हो जाते थे, क्योंकि आमने-सामने खड़े अधिकांश लोग उनके अजीज हुआ करते थे। ऐसे में उन लोगों की तनी हुई हुईं भौंहें अपने आप झुक जाया करती थीं।
मंजुल जोशी बरेली में 1982 से 1984 तक एसडीएम, फिर 1990 से 1995 तक सिटी मजिस्ट्रेट और एडीएम सिटी के रूप में तैनात रहे। बाद में दो साल के लिए नैनीताल स्थित प्रशासनिक अकादमी में तैनात रहे और वर्ष 1997 में फिर एडीएम सिटी के पद पर नियुक्त किए गए। बाद में कुछ समय के लिए अपर आयुक्त के पद भी तैनात रहें। वर्ष 2001 में अलग उत्तराखंड राज्य बनने पर उन्हें वहां भेज दिया गया।
बरेली में तैनाती के दिनों को लेकर जब उनसे बात शुरू हुई तो जैसे उनके अंदर से 10 साल से ज्यादा समय तक बरेली में गुजारे गए समय की बहुत सी यादों की गांठें खुलती चली जा रही हों। वह कहने लगे कि बरेली बहुत हसीन जगह थी और यहां का सहजीवन लाजवाब था। जैसे पूरे देश का सहजीवन बिखर रहा है, उसी तरह बरेली में भी दरारें खिंचती जा रही हैं। पहले ऐसा नहीं था। सत्ता में भागीदारी और आर्थिक साधनों को लेकर टकराव तो अवश्य होते थे, लेकिन दिलों की दूरियां कम नहीं होती थीं।
बरेली में पहली बार बाबरी मस्जिद विध्वंस के समय जो बवाल हुआ उसमें कई लोगों की जानें गईं। हालात इतने बिगड़ गए कि प्रशासन के हाथ से निकल गए और शासन के निर्देश पर स्थिति को नियंत्रित करने के लिए सेना बुलानी पड़ी। धीरे-धीरे माहौल शांत हुआ, जीवन पटरी पर लौटने लगा, लेकिन दिलों में खाई चौड़ी हो गई। बाद में वर्ष 1995 में बिहारी पुर मोहल्ले से एक जुलूस निकाला गया और सिविल लाइन्स में हनुमान मंदिर के सामने नमाज अता किए जाने से बवाल भड़क उठा।
उन लोगों ने संभालने के लिए बहुत प्रयास किए। अगले दिन तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती का बरेली दौरा प्रस्तावित था। यह माहौल खराब करने की जान-बूझकर कोशिश की गई थी। हालात नियंत्रित न होते देखकर शहर में कर्फ्यू लगाना पड़ा और पूरे प्रशासनिक अमले का ट्रांसफर कर दिया गया। हालांकि दो साल बाद पुनः एडीएम सिटी के पद पर तैनाती मिल गई, लेकिन शहर की फिजां काफी बदल चुकी थी। लोग उनकी बात तब भी सुनते थे, लेकिन अदब-लिहाज तो कम हुआ था।
वह कहते हैं कि बरेली की बसावट ऐसी है कि बिना सहजीवन के अस्तित्व ही नहीं बचेगा। प्रशासनिक अफसरों को इसे समझना होगा। इसके लिए उन्हें बरेली की गलियों में जाकर देखना होगा। सामाजिक ताने-बाने को समझना होगा। वहां के लोगों से राब्ता कामय करना होगा। उनके सुख-दुख में शरीक होना होगा। वह कहते हैं कि उम्मीद अभी कायम है। शहर में कई इंस्टीट्यूशन ऐसे हैं जो अभी भी समाज को जोड़े रखने की कोशिशों में जुड़े हुए हैं। वह कमजोर अवश्य हुए हैं, लेकिन पूरी तरह से खारिज नहीं हुए हैं, इससे एक उम्मीद अवश्य जगती है। अंत में वह कहते हैं कि
...भरोसे पर किसी के जब भी ठोकर खाई होती है
तो सारी जिंदगी उस जख्म की तुरपाई होती है।
