न्यायपालिकाओं को न्यायिक प्रक्रिया में सक्रिय भागीदार बनना होगा : हाईकोर्ट
प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक मामले में पोक्सो अधिनियम के तहत चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द करते हुए कहा कि जब किसी मामले में परिणाम पहले से ही तय हो यानी आरोपी का डिस्चार्ज या बरी होना, तब न्यायिक प्रणाली का बहुमूल्य समय और संसाधन ऐसे मार्ग अपनाने में क्यों व्यर्थ किए जाएं।
ऐसे मामलों में किसी महिला को महीनों और वर्षों तक अदालत परिसर में इसलिए आना पड़े कि वह अपने ही पति को उस आरोप से बरी करवा सके, जिसे पत्नी स्वयं खारिज कर चुकी हो, तो यह उत्पीड़न का साधन बन जाएगा।
बार-बार होने वाले खर्च, और कभी-कभी कानूनन आवश्यक से अधिक भुगतान की विवशता के अतिरिक्त समाज की कड़वी निगाहों, आलोचनाओं और उन तमाम टिप्पणियों का सामना करना, जो किसी महिला की गरिमा के विरुद्ध हो सकती हैं, इसे भी नजरअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
उक्त टिप्पणी न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेन्द्र की एकलपीठ ने अश्विनी आनंद की याचिका को स्वीकार करते हुए की। कोर्ट ने मामले का मार्मिक अवलोकन कर निष्कर्ष निकाला कि न्यायपालिका ऐसे मामलों में केवल मूकदर्शक या शांत पर्यवेक्षक नहीं बनी रह सकती, बल्कि उसे न्यायिक प्रक्रिया में सक्रिय भागीदार बनना होगा और सामाजिक न्याय की सेवा में कानून का उपयोग करने के लिए उद्देश्यपूर्ण और सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाना होगा।
न्यायाधीशों को भारतीय जीवन की सामाजिक-आर्थिक वास्तविकताओं के प्रति संवेदनशील रहना चाहिए, जिससे हर आंख से हर आंसू पोंछा जा सके। मामले के अनुसार पीड़िता के पिता ने अप्रैल 2024 में प्राथमिकी दर्ज कर आरोप लगाया कि याची ने उनकी बेटी का अपहरण कर लिया।
पुलिस ने जांच के बाद आईपीसी की धारा 363, 366 और पोक्सो की धारा 11/12 के तहत आरोप पत्र दाखिल कर दिया, लेकिन कथित पीड़िता ने स्वयं सीआरपीसी की धारा 161 के तहत अपने बयान में आरोपों से साफ इनकार करते हुए कहा कि वह स्वेच्छा से घर से गई थी और आरोपी के साथ उसके किसी प्रकार के शारीरिक संबंध नहीं थे।
पीड़िता ने निर्विवाद रूप से वयस्क होने के बाद जून 2025 में याची से विवाह कर लिया। विवाह को उत्तर प्रदेश विवाह पंजीकरण नियम, 2017 के तहत विधिवत पंजीकृत भी करवाया गया। उसने हाईकोर्ट के समक्ष हलफनामा दाखिल कर अपने पति की याचिका का समर्थन किया और मामले को निरस्त करने का अनुरोध किया।
हालांकि राज्य ने आपराधिक कार्यवाही जारी रखने पर जोर देते हुए तर्क दिया कि पोक्सो के तहत अपराध समाज के विरुद्ध होते हैं और समझौते के आधार पर समाप्त नहीं किए जा सकते, लेकिन कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के अनेक फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि बीएनएसएस (पूर्व धारा 482 सीआरपीसी) की धारा 528 के तहत निहित शक्तियों का इस्तेमाल न करना विधायिका द्वारा प्रदत्त अधिकारों के उद्देश्य को ही नष्ट कर देगा।
कोर्ट ने टिप्पणी की कि जब न्याय का उद्देश्य त्वरित हस्तक्षेप की मांग करे, तब न्यायालय “मूकदर्शक” नहीं रह सकता। अतः यह देखते हुए कि दोनों पक्षों ने वैध रूप से विवाह कर लिया है और पीड़िता अपने पति के समर्थन में है तथा मुकदमे के जारी रहने का कोई औचित्य नहीं बनता, कोर्ट ने आरोप पत्र सहित संपूर्ण आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया।
