कैंपस में पहला दिन : प्रथम श्रेणी प्राप्त करने का रहा दबाव
मेरे लिए कॉलेज का पहला दिन उम्मीदों से भरा रहा। मेरी स्नातक (बी.ए.) की पढ़ाई राजकीय महाविद्यालय बागेश्वर से हुई। यह सरयू नदी के किनारे तीन भवनों के रूप में था, जिनमें से एक भवन टिन शेड के रूप में था और एक मुख्य भवन, जिसमें एक हॉल और प्राचार्य कक्ष और दूसरे भवन में एक लाइब्रेरी और कुछ कक्षाएं होती थीं।
पहले दिन जब मैं महाविद्यालय पहुंचा तो मेरी मुलाकात महाविद्यालय के प्राचार्य डॉक्टर रामकुमार से हुई। मैंने उनसे प्रवेश के साथ-साथ अपने परीक्षा परिणाम के बारे में भी बताया तो उन्होंने बड़े खुश होकर मुझे प्रवेश के बारे में जानकारी दी। मैं अपने सत्र में राजकीय इंटर कॉलेज बागेश्वर का कला विषयों से अकेला प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण विद्यार्थी था, इसलिए उन्होंने प्रवेश प्रभारी से कहा कि देखो, महाविद्यालय में एक प्रथम विद्यार्थी आ रहा है।
इसके अलावा उन्होंने मुझे स्कॉलरशिप तथा अन्य योजनाओं के बारे में भी जानकारी दी। महाविद्यालय के पहले दिन ही एक सुसज्जित पुस्तकालय देखा, जिसमें हमारे विषय की पुस्तक कम थी, लेकिन पुस्तकों के प्रति मेरे प्रेम के कारण मुझे अनेक पुस्तकों से जुड़ने का अवसर मिला। हिंदी, संस्कृत, राजनीति विज्ञान और अंग्रेजी की कक्षाओं में मुझे उपस्थित रहकर बहुत आनंद आया।
महाविद्यालय में प्रवेश प्राप्त करने के बाद अपने पुराने इंटरमीडिएट के समय के अनेक साथी कक्षा में दिखाई दिए, उनमें एक स्पर्धा भाव भी देखा, स्नातक कक्षा के दौरान निरंतर यह दबाव भी बना रहा कि महाविद्यालय में भी प्रथम श्रेणी प्राप्त करनी है। बाद में अपने शैक्षिक जीवन में आने के बाद पता चला कि विश्वविद्यालय शिक्षा में किस प्रकार चैलेंज आते हैं।-डॉ. नवीन चंद्र लोहनी, कुलपति, उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय, हल्द्वानी
