Bareilly : शिकायतों का डर : चुनावी सीजन में नए कामों से दूरी बना रहे प्रधान

Amrit Vichar Network
Edited By Pradeep Kumar
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पंचायत चुनाव नजदीक आते ही ग्राम प्रधानों के रवैये में दिख रहे बड़े बदलाव, विकास कार्यों को हाशिये पर धकेला

महिपाल गंगवार, बरेली। पंचायत चुनाव 2026 की आहट ने गांवों की नब्ज थाम दी है। जैसे-जैसे त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव नजदीक आ रहे हैं, वैसे-वैसे ग्राम प्रधानों और पंचायत सचिवों की सक्रियता सिमटती जा रही है। हालात यह हैं कि गांवों में विकास कार्य ठप हैं, फाइलें धूल खा रही हैं और जरूरतमंद ग्रामीण दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर हैं। चुनावी सीजन में शिकायतों के डर ने विकास को हाशिये पर धकेल दिया है।

इस ठहराव के पीछे सबसे बड़ा कारण आर्थिक संकट बताया जा रहा है। पहले से कराए गए विकास कार्यों का करोड़ों रुपये का भुगतान बीते एक साल से लटका है। प्रधानों का कहना है कि जब पुराने भुगतान ही नहीं हो रहे, तो नए काम शुरू करना आर्थिक जोखिम मोल लेने जैसा है। दूसरा बड़ा कारण फरवरी में संभावित आचार संहिता लागू होने का डर है। प्रधानों और अधिकारियों को आशंका है कि चुनावी प्रक्रिया के दौरान कोई भी नया काम जांच और शिकायतों के घेरे में आ सकता है। ऐसे में स्थिति यह है कि सिर्फ प्रधान ही नहीं, बल्कि ब्लॉक और पंचायत स्तर के अधिकारी भी फाइलों पर हस्ताक्षर करने से कतरा रहे हैं। छोटे-छोटे काम नाली की मरम्मत, सड़क पैचवर्क, हैंडपंप या स्ट्रीट लाइट तक लटकाए जा रहे हैं। गांवों में विकास ठप है, लेकिन कागजों में सब पूरे दिखाए जा रहे हैं।

''काम न करो, सुरक्षित रहो'' की नीति अपना रहे प्रधान
पंचायत चुनाव नजदीक आते ही विकास कार्यों से ज्यादा शिकायतों की राजनीति तेज हो जाती है। अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पंचायती राज विभाग में विभिन्न स्तरों से हर दिन करीब 15 से 20 शिकायतें आ रही हैं। ऐसे में प्रधानों पर भ्रष्टाचार के आरोप, जांच की तलवार और नोटिसों की बौछार ने माहौल और भयभीत बना दिया है। कई प्रधान मानते हैं कि चुनाव से पहले काम करना मतलब खुद को शिकायतों के लिए तैयार करना, इसलिए ''काम न करो, सुरक्षित रहो'' की नीति अपनाई जा रही है। प्रधानों को डर इसका भी है कि किसी गली में काम कराने से दूसरे पक्ष की नाराजगी बढ़ सकती है, जो चुनाव में नुकसान पहुंचाएगी। इस डर ने विकास को पूरी तरह जकड़ लिया है।

ग्राम पंचायतों में काम ठप होने से ग्रामीणों में नाराजगी
ग्राम पंचायतों में विकास कार्य ठप होने से ग्रामीणों में गहरी नाराजगी है। उनका कहना है कि चुनाव का बहाना बनाकर गांवों की अनदेखी की जा रही है। नालियां टूटी हैं, सड़कें खराब हैं और मूलभूत सुविधाएं अधूरी पड़ी हैं। ग्रामीणों का मानना है कि अगर प्रधान ईमानदारी से काम करें तो शिकायतों का डर नहीं होना चाहिए। उनका कहना है कि चुनावी सुरक्षा से ज्यादा जरूरी गांव का विकास है, क्योंकि जनता अंततः काम के आधार पर ही अपना फैसला करती है।

कागजों में रोजगार, जमीन पर सन्नाटा
जनपद के 15 ब्लॉकों की 1188 ग्राम पंचायतों में दो लाख से अधिक श्रमिक पंजीकृत हैं। बावजूद सिर्फ 9765 श्रमिक ही काम कर रहे हैं। यह आंकड़ा प्रशासनिक दावों की पोल खोलने के लिए काफी है। यही नहीं, बड़ी संख्या में श्रमिक महीनों से मजदूरी के लिए भटक रहे हैं। भुगतान न होने का डर इतना गहरा है कि वह काम मांगने से भी बच रहे हैं। दबी जुबान से अधिकारी भी मानते हैं कि पंचायतों में काम प्रस्तावित हैं, लेकिन श्रमिक तैयार नहीं हैं। उनका साफ कहना है कि बिना मजदूरी के काम नहीं करेंगे। इसके चलते नालियां, सड़कें, हैंडपंप और अन्य जरूरी निर्माण कार्य अटके हुए हैं।

सर्दी के मौसम में ग्राम पंचायतों में कार्य की रफ्तार हमेशा ही धीमी होती है। हमारा फोकस ग्राम पंचायत में अधूरे कार्यों को हर हाल में पूरा करने का है। इसको लेकर आए दिन ग्राम निधि की समीक्षा होती है। यह जरूर है कि मनरेगा में भुगतान की लेटलतीफी से कुछ ग्राम पंचायतों में प्रधान काम कराने से पीछे हट रहे हैं, फिर भी किसी न किसी तरह से अधूरे कार्य पूरे कराए जा रहे हैं। -कमल किशोर, डीपीआरओ।

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