सकट व्रत : लोक संस्कृति की पावन परंपरा
भारतीय सनातन संस्कृति में व्रत-पर्वों का अद्वितीय महत्व है। इन्हीं पावन व्रतों में से एक है ‘तिलकुटी व्रत’ या ‘सकट चौथ’, जो भगवान गणेश जी को समर्पित है। यह व्रत माघ मास के कृष्ण पक्ष चतुर्थी तिथि को विशेष विधि-विधान से मनाया जाता है। माताएं अपनी संतान की दीर्घायु, सुख-समृद्धि और सर्वांगीण कल्याण के लिए यह व्रत रखती हैं। विघ्नहर्ता गणेश की आराधना से सभी संकटों का निवारण होता है और जीवन में शुभता का संचार होता है। तिलकुटी व्रत को सकट चौथ, संकष्टी चतुर्थी, तिल चतुर्थी और माघी चतुर्थी जैसे विभिन्न नामों से जाना जाता है। संकष्टी शब्द का अर्थ संकटों को हरने वाला होता है। -जयदेव राठी भराण
भगवान गणेश को संकट हरने वाले देवता के रूप में पूजा जाता है, इसलिए इस व्रत को संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है। ‘तिलकुटी’ नाम इसलिए पड़ा, क्योंकि इस दिन तिल और गुड़ से बने पदार्थ, विशेषकर तिलकुट्टा या तिल के लड्डू, भगवान गणेश को भोग स्वरूप अर्पित किए जाते हैं। भगवान गणेश को मोदक और लड्डू अत्यंत प्रिय हैं और तिल के लड्डू इस व्रत का मुख्य प्रसाद होते हैं। भगवान गणेश की वंदना से व्रत का शुभारंभ होता है।
पौराणिक कथा के अनुसार एक बार देवता अनेक विपत्तियों में घिरे हुए थे। वे सहायता मांगने भगवान शिव के पास गए। उस समय कार्तिकेय और गणेश जी भी वहां उपस्थित थे। भगवान शिव ने पूछा कि कौन देवताओं के कष्टों का निवारण कर सकता है।दोनों पुत्रों ने स्वयं को सक्षम बताया। भगवान शिव ने परीक्षा लेते हुए कहा कि जो सबसे पहले पृथ्वी की परिक्रमा करके आएगा वही देवताओं की सहायता करेगा।
कार्तिकेय तुरंत अपने मोर पर बैठकर निकल पड़े, लेकिन गणेशजी सोच में पड़ गए कि उनके वाहन चूहे पर पूरी पृथ्वी की परिक्रमा में बहुत समय लगेगा। तब बुद्धिमान गणेशजी ने अपने माता-पिता भगवान शिव और माता पार्वती की परिक्रमा की और कहा कि माता-पिता में संपूर्ण ब्रह्मांड समाया है। इससे प्रसन्न होकर भगवान शिव ने गणेशजी को विजयी घोषित किया और आशीर्वाद दिया कि चतुर्थी के दिन जो भक्तिपूर्वक गणेश की पूजा करेगा और रात्रि में चंद्रमा को अर्घ्य देगा, उसके तीनों ताप- दैहिक, दैविक और भौतिक दूर हो जाएंगे।
एक साहूकार और साहूकारनी थे, जो धर्म-पुण्य में विश्वास नहीं रखते थे। इस कारण उन्हें संतान सुख प्राप्त नहीं हुआ। एक दिन पड़ोसन सकट चौथ की कहानी सुन रही थी। जब साहूकारनी ने पूछा कि यह क्या है, तो पड़ोसन ने बताया कि इस व्रत से अन्न, धन, सुहाग और संतान की प्राप्ति होती है। साहूकारनी ने मन्नत मांगी कि यदि उसे गर्भ ठहर जाए, तो वह सवा सेर तिलकुट करेगी। उसकी मनोकामना पूर्ण हुई। फिर उसने पुत्र प्राप्ति के लिए ढाई सेर तिलकुट का संकल्प लिया और उसे पुत्र की प्राप्ति हुई, लेकिन समृद्धि आने पर साहूकारनी व्रत और संकल्प भूल गई।
परिणामस्वरूप चौथ माता नाराज हो गईं और उनके पुत्र को संकट में डाल दिया। जब साहूकारनी को अपनी भूल का एहसास हुआ, तो उसने ढाई मन का तिलकुट बनाकर विधिपूर्वक सकट चौथ का व्रत किया। गणेश जी और चौथ माता प्रसन्न हुए और उनके पुत्र को सकुशल घर लौटा दिया। माघ मास में तिल का विशेष महत्व है। तिल से स्नान, होम, दान, भोजन और तिल युक्त जल पान - ये षट्तिल कर्म पापों का नाश करने वाले हैं।
माघ मास में तिल दान, तिल तेल से भोजन और तिल से हवन करने वाला परम गति को प्राप्त करता है। तिल के औषधीय गुण अद्भुत हैं - यह शरीर में उष्णता उत्पन्न करता है, कैल्शियम, आयरन, मैग्नीशियम का उत्कृष्ट स्रोत है, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है, हड्डियों और दांतों को मजबूत बनाता है तथा त्वचा और बालों के लिए लाभकारी है। गुड़ भी ऊर्जा का तत्काल स्रोत है और रक्त शुद्धिकरण में सहायक है। तिल-गुड़ का संयोजन शीतकाल में पूर्ण आहार का कार्य करता है। यह हमारे पूर्वजों की वैज्ञानिक सोच का प्रमाण है।
माताएं अपनी संतान की दीर्घायु, सुख-समृद्धि और निरोगी जीवन के लिए यह व्रत रखती हैं। यह व्रत परिवार में एकता और प्रेम का प्रतीक है। ऐसी मान्यता है कि तिलकुट को पुत्र द्वारा खोलने और भाई-बंधुओं में बांटने से आपसी प्रेम-भावना की वृद्धि होती है। कुछ क्षेत्रों में तिलकुट का बकरा बनाया जाता है जिसकी गर्दन घर का छोटा बच्चा काटता है। बिहार और झारखंड में इसे तिलकुट चौथ, उत्तर प्रदेश में सकट चौथ, राजस्थान में संकष्टी चतुर्थी और महाराष्ट्र में तिल गुड़ घ्या आणि गोड गोड बोला (तिल-गुड़ लो और मीठा बोलो) कहा जाता है।
लोक गीतों में तिलकुटी का विशेष वर्णन मिलता है। बिहार की लोक परंपरा में गाया जाता है: ‘माघ मासे के चउथी, करिहैं तिलकुट के पूजा, गणेशा के मनइबै, बिटवा के रक्खइबै’ (माघ मास की चौथ पर, करेंगे तिलकुट की पूजा, गणेश को मनाएंगे, बेटे की रक्षा करेंगे)। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में जब परिवार बिखरते जा रहे हैं, तब तिलकुटी जैसे पर्व परिवार को एक सूत्र में बांधते हैं। यह व्रत हमें अनेक शिक्षाएं देता है।
