गलत आधारों पर यौन उत्पीड़न के दोषी करार पिता की सजा को हाईकोर्ट ने किया रद्द
प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नाबालिग बेटी से यौन उत्पीड़न करने के एक मामले में दोषी ठहराए गए एक सरकारी कर्मचारी (लेखपाल) को जमानत देते हुए कहा कि अपील लंबित रहने के दौरान केवल दोषसिद्धि के आधार पर आरोपी के जीवन-यापन के अधिकार को पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा सकता, विशेषकर तब जब अपील की शीघ्र सुनवाई की संभावना कम हो। यह आदेश न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति प्रशांत मिश्रा (प्रथम) की खंडपीठ ने प्रवेश सिंह तोमर की जमानत याचिका को स्वीकार करते हुए पारित किया।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आपराधिक अपील वर्ष 2024 की है और लंबित मामलों के भारी दबाव को देखते हुए निकट भविष्य में इसकी सुनवाई संभव प्रतीत नहीं होती। मामले में ट्रायल कोर्ट ने 20 मई 2024 को पिता/आरोपी को पोक्सो अधिनियम की धारा 6 तथा आईपीसी की विभिन्न धाराओं के तहत पुलिस स्टेशन कोतवाली, फतेहगढ़ में दर्ज मामले में दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। इसी आदेश के तहत आरोपी के मित्र विमल कुमार और अधिवक्ता सोनू तिवारी को भी आजीवन कारावास की सजा दी गई थी। तीनों आरोपियों ने निचली अदालत के फैसले को उच्च न्यायालय के समक्ष चुनौती दी।
मामले के अनुसार आरोपी की अलग रह रही पत्नी ने 12 जनवरी 2020 को एफआईआर दर्ज कर आरोप लगाया था कि उसके पति और पति के मित्रों द्वारा उसकी बेटी का तीसरी कक्षा से ही यौन उत्पीड़न किया जा रहा था, जब वह मात्र 10 साल की थी, उसे विभिन्न स्थानों पर ले जाकर दुष्कर्म किया गया और गर्भवती होने पर जबरन गर्भपात कराया गया।
आरोप यह भी था कि विरोध करने पर मां और बेटी के साथ मारपीट व धमकी दी गई। अपीलकर्ता की मां (पीड़िता की दादी) और दूसरी पत्नी भी इस दुर्व्यवहार में शामिल थीं। अपील की सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि दुष्कर्म की एफआईआर पति द्वारा तलाक की कार्यवाही शुरू करने के बाद प्रतिशोध स्वरूप दर्ज कराई गई थी तथा अभियोजन गवाहियों में कई विरोधाभास हैं।
मामले पर विचार करते हुए कोर्ट ने पाया कि पीड़िता के दावे के अनुसार शरीर पर कोई बाहरी या आंतरिक चोट नहीं पाई गई। आगे यह भी देखा गया कि पीड़िता को उसकी माँ द्वारा झूठे आरोपों का समर्थन करने के लिए सिखाया-पढ़ाया गया था। अपीलकर्ता ने अपनी बेटी को ऐसे प्रभावों से दूर रखने के लिए उसे बोर्डिंग स्कूल भेज दिया था।
हालांकि जब स्कूल अधिकारियों ने उसके पास से एक प्रतिबंधित मोबाइल फोन बरामद किया, तो अपीलकर्ता ने उसे फटकारा, परिणामस्वरूप पीड़ित बेटी नाराज हो गई और अपनी मां के प्रभाव में आकर उसने उसे झूठा फंसा दिया। हालांकि ट्रायल कोर्ट ने निर्णय करते समय उक्त सभी महत्वपूर्ण तथ्यों को नजरअंदाज कर दिया।
इसके अतिरिक्त मुकदमे के दौरान अपीलकर्ता से सीआरपीसी की धारा 313 के तहत लंबे और समेकित प्रश्न पूछे गए और वह उनका प्रभावी ढंग से उत्तर नहीं दे सका और अपने खिलाफ दोषी ठहराने वाली परिस्थितियों को स्पष्ट नहीं कर सका, लेकिन हाईकोर्ट के समक्ष आरोपों का खंडन करते हुए अपीलकर्ता ने कुछ तस्वीरें प्रस्तुत कीं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि अपीलकर्ता कहीं भी अपनी बेटी को लेकर अकेले नहीं गया, बल्कि पारिवारिक छुट्टियों के दौरान मित्रों और रिश्तेदारों के साथ वह अपनी बेटी के साथ सार्वजनिक स्थानों पर गया था।
अंत में कोर्ट ने माना कि मामले में विचारणीय प्रश्न मौजूद हैं। अतः दोषसिद्धि और सजा को निलंबित करते हुए आरोपियों को जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया, साथ ही रजिस्ट्री को छह सप्ताह के भीतर आवश्यक औपचारिकताएं पूरी कर अपील को यथासमय सूचीबद्ध करने के निर्देश भी दिए।
