जॉब का पहला दिन: सेवा, संकल्प और संतोष
बेसिक शिक्षा विभाग में मेरी सेवा का शुभारंभ 17 दिसंबर 2009 को हुआ। मेरी पहली नियुक्ति जनपद संभल में हुई थी। पवासा ब्लॉक के अंतर्गत मेरा विद्यालय मुख्य मार्ग से लगभग सात किलोमीटर भीतर स्थित एक ग्रामीण क्षेत्र में था। नियुक्ति के पहले दिन जब मैं विद्यालय की ओर जा रहा था, तो मन में एक अजीब-सी बेचैनी और असमंजस था। यह सोचकर अनेक प्रश्न मन में उठ रहे थे कि इतने दूर-दराज क्षेत्र में कार्य कैसे होगा, यहां नौकरी कैसे निभा पाऊंगा। आशंकाएं स्वाभाविक थीं। लेकिन जैसे ही मैं विद्यालय पहुंचा, मेरे भीतर एक नया आत्मविश्वास जाग उठा। दरअसल, अध्यापक बनना मेरा बचपन का सपना रहा है। मेरी माताजी स्वयं अध्यापन कार्य से जुड़ी रही हैं। उन्हें बच्चों को पढ़ाते हुए देखकर मेरे मन में भी यह लालसा जन्म लेती रही कि मैं भी एक दिन शिक्षक बनूं और बच्चों के जीवन में शिक्षा का प्रकाश फैलाऊं।
शिक्षण मेरे लिए कभी केवल एक नौकरी नहीं रहा, बल्कि यह मेरा जुनून है। बच्चों को पढ़ाना, उनके भविष्य को संवारना और उनके जीवन को दिशा देना-यही मेरे जीवन का उद्देश्य रहा है। वर्ष 2009 से 2016 तक मैं संभल जनपद में कार्यरत रहा। इसके पश्चात 2016 में मेरा स्थानांतरण बरेली हुआ, जहां आंवला स्थित प्राथमिक विद्यालय देवी में मैंने प्रधानाध्यापक के रूप में कार्यभार ग्रहण किया। उस विद्यालय से मेरा गहरा भावनात्मक जुड़ाव हो गया। मैंने विद्यालय के सर्वांगीण विकास के लिए पूरे मनोयोग से कार्य किया। विद्यालय के भौतिक कायाकल्प से लेकर शैक्षिक वातावरण के सुदृढ़ीकरण तक अनेक महत्वपूर्ण कार्य किए। अपने इन प्रयासों से मुझे गहरा आत्मसंतोष प्राप्त हुआ।
जुलाई 2025 में पदोन्नति के उपरांत मैं जूनियर विद्यालय सिउलिया में कार्यरत हुआ। यहां मैं कक्षा छह से आठ तक के विद्यार्थियों को शिक्षण कार्य करता हूं। अपने कार्य से मुझे आज भी उतना ही लगाव और प्रेम है। विद्यार्थियों के साथ समय बिताना, उनकी जिज्ञासाओं को समझना और उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करना मुझे आंतरिक आनंद प्रदान करता है। विद्यालय का समस्त स्टाफ अत्यंत सहयोगी, सकारात्मक और समर्पित भावना से कार्य करने वाला है।
मैं बेसिक शिक्षा विभाग में अध्यापक के रूप में कार्य करने को केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि समाज सेवा का सर्वोत्तम माध्यम मानता हूं। हम ऐसे बच्चों को शिक्षा प्रदान करते हैं जो साधन-संपन्न नहीं हैं, जिन्हें निजी विद्यालयों में पढ़ने की सुविधा उपलब्ध नहीं है और जिनकी ओर प्रायः समाज का ध्यान नहीं जाता। यह कार्य न केवल हमारे जीवन-यापन का माध्यम है, बल्कि उन बच्चों के जीवन-कल्याण का मार्ग भी प्रशस्त करता है। हम उनके भीतर छिपी प्रतिभाओं को पल्लवित करते हैं और उन्हें आगे बढ़ने का अवसर प्रदान करते हैं। बेसिक शिक्षा विभाग के अध्यापक जहां एक ओर अपना जीवन-यापन करते हैं, वहीं दूसरी ओर बच्चों को शिक्षित कर पुण्य का अर्जन भी करते हैं। इसलिए इस सेवा को केवल रोजगार नहीं, बल्कि समाज सेवा और राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्य के रूप में देखना चाहिए। जब शिक्षा इस भावना के साथ प्रदान की जाती है, तो निश्चय ही उससे अधिक गुणवत्तापूर्ण, संवेदनशील और प्रभावशाली शिक्षा का सृजन होता
