मकर संक्रांति पर्व : खिचड़ी के चार यार - दही, घी, पापड़ और अचार, विविधता में एकता की प्रतीक, जानें सुपर फ़ूड का महत्त्व   

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Published By Anjali Singh
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पटना। मकर संक्रांति पर जहां बिहार के ज्यादातर क्षेत्रों में चूड़ा- दही खाने की परंपरा है, वहीँ इस अवसर पर लजीज खिचड़ी खाने और खिलाने का चलन भी है। खिचड़ी कहीं मंदिर का प्रसाद होता है तो कहीं गरीबों का भोजन। खिचड़ी के बारे में एक प्रचलित कहावत भी है, खिचड़ी के हैं चार यार दही, पापड़, घी, आचार। यानी, जब बढ़िया दही, शुद्ध घी, लजीज मसालेदार पापड़ और बेहतरीन आचार के साथ जब खिचड़ी परोसी जाती है, तब यह न प्रसाद होती है, न गरीब का भोजन, बल्कि ऐसी खिचड़ी स्टेटस सिंबल होती है। 

मेजबान की हैसियत बताने वाली होती खिचड़ी 

अपने चारों यार के साथ थाली में आयी ऐसी खिचड़ी मेजबान की हैसियत बताने वाली होती है। 1970 के दशक में जब डा जयप्रकाश नारायण और राम मनोहर लोहिया के नेतृत्व में गैर- कांग्रेसवाद की राजनीति तेज हुई, उस दौर में भी खिचड़ी ने शब्द मात्र से अपनी मजबूत जगह राजनीति में बनायीं। तब कई राज्यों की विपक्षी दलों की मिली- जुली सरकारें बनीं थी, लेकिन उन्हें खिचड़ी सरकार की संज्ञा से नवाजा गया। सदियों पुराने भोजन खिचड़ी का राजनीतिकरण का दौर भी शायद यहीं से शुरू हुआ। 

हालांकि आयुर्वेदिक चिकित्सक वैद्य रंजन कुमार का मानना है कि आसानी से पकने और जल्दी पचने वाली खिचड़ी ऐसा आहार है, जो शरीर में विद्यमान वात, पित्त और कफ के संतुलन को बनाने में सहायक होता है। खिचड़ी शरीर में बनने वाले हानिकर रसायन को बेअसर करने वाला भोजन है। भोजन के रूप में खिचड़ी एक देसी फास्ट फूड है। 

सुपर फूड के रूप में पेश 

भारत सरकार ने ग्लोबल फूड एक्सपो की ओर से आयोजित वर्ल्ड फूड इंडिया- 2017 में इसे देश की तरफ से सुपर फूड के रूप में पेश किया था। उसी दौरान आयोजित कार्यक्रम में केंद्र सरकार ने खिचड़ी को भारत का सुपर फूड और क्वीन ऑफ़ आल फूड के रूप में दुनिया के समक्ष परोसा गया था। दाल और चावल को सामान अनुपात में मिलाकर आसानी से पकने वाली खिचड़ी के महत्व को ध्यान में रखकर ही शायद इसे धार्मिक- सांस्कृतिक रूप दिया गया है। 

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