संपादकीय: बेअसर रहेगा टैरिफ

Amrit Vichar Network
Published By Monis Khan
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डोनाल्ड ट्रंप के नए एलान और ईरान को लेकर अमेरिकी सख्त रुख ने भारत के सामने एक बार फिर वही रणनीतिक स्वायत्तता बनाम वैश्विक दबाव वाली चुनौती खड़ी कर दी है। सच तो यह है कि अमेरिका इस रास्ते भारत पर केवल आर्थिक नहीं, बल्कि राजनीतिक-रणनीतिक दबाव भी बढ़ाना चाहता है। 75 प्रतिशत टैरिफ की बात सैद्धांतिक आकलन अधिक है, न कि कोई घोषित व्यावहारिक यथार्थ, क्योंकि भारत-ईरान व्यापार का मौजूदा आकार इतना सीमित है कि उसका समग्र भारतीय अर्थव्यवस्था पर सीधा असर बहुत बड़ा नहीं दिखता।

 2018-19 में जहां यह व्यापार 17 अरब डॉलर था, वहीं अब घटकर लगभग 1.68 अरब डॉलर रह गया है। ईरान भारत के व्यापारिक साझेदारों में 63 वें स्थान पर है। अमेरिकी टैरिफ और दबाव का प्रभाव भारत से अधिक चीन, ब्राजील या तुर्किए जैसे देशों पर पड़ सकता है, जिनके ईरान से ऊर्जा और अन्य व्यापारिक संबंध हमसे कहीं गहरे हैं। अलग तथ्य है कि अमेरिकी टैरिफ, सेकेंडरी सैंक्शन्स और वित्तीय प्रतिबंध मिलकर व्यापार को महंगा और जटिल जरूर बनाते हैं। यह सच है कि अमेरिकी संकेतों के बाद रूस से कच्चे तेल के आयात में भारत की हालिया कटौती गौर तलब जरूर है, पर ईरान से अमेरिकी दबाव में व्यापार पूरी तरह बंद नहीं होगा। 

भारत पहले से ही अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण सीधे व्यापार के बजाय तीसरे देशों, वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों और सीमित वस्तु-आधारित लेन-देन का रास्ता अपना रहा है। भारत ने पूरी तरह नए हालात के अनुरूप अपने रास्ते खोज लिए हैं, इसलिये अमेरिकी टैरिफ अटैक का प्रभाव सीमित रहेगा। हालांकि असर “सीमित” होने का अर्थ “शून्य” नहीं होता। ईरान से आयात होने वाले एसाइक्लिक अल्कोहल डेरिवेटिव्स, पेट्रोलियम गैस, पेट्रोलियम कोक, रसायन, सूखी खजूरें और अन्य वस्तुएं नई व्यवस्था में कुछ महंगी हो सकती हैं। इसका बोझ अंततः भारतीय उद्योग और उपभोक्ता पर आ सकता है, भले ही वह क्रमिक और आंशिक हो। रणनीतिक स्तर पर असली सवाल चाबहार बंदरगाह का है। 

2024 में 10 साल के अनुबंध के साथ भारत ने चाबहार में बड़ा निवेश किया है। यह परियोजना केवल व्यापारिक नहीं, बल्कि मध्य एशिया और अफगानिस्तान तक भारत की पहुंच का द्वार है। ईरान में राजनीतिक-आर्थिक अस्थिरता और ट्रंप की टैरिफ नीति इसके संचालन को धीमा कर सकती है, लेकिन पूरी तरह रोक पाना आसान नहीं होगा, क्योंकि इसमें भारत के दीर्घकालिक हित जुड़े हैं। यह तो तय है कि भारत अमेरिकी दबाव के आगे आक्रामक रुख कतई नहीं अपनाएगा। मौजूदा संकेत बताते हैं कि भारत “टकराव” के बजाय “संतुलन” की नीति पर चलेगा।

 भारत-अमेरिका रिश्ते आज आर्थिक, तकनीकी और सुरक्षा स्तर पर गहरे हैं, लेकिन भारत की विदेश नीति की परंपरा यह रही है कि वह किसी एक ध्रुव के सामने पूरी तरह न झुके। भविष्य में पश्चिम एशिया, अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया में बढ़ते बाजार, और प्रस्तावित एफटीए, भारत की किसी एक देश पर निर्भरता को काफी कम कर सकते हैं। ईरान के साथ ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक रिश्तों को देखते हुए भारत को बिना अनावश्यक उकसावे या आत्मसमर्पण के संवाद और सहयोग के दरवाजे खुले रखने चाहिए, यही हमारे लिए सबसे व्यावहारिक और सशक्त रास्ता है।