INSV कौंडिन्य: समुद्र की लहरों पर भारतीय गौरव

Amrit Vichar Network
Published By Anjali Singh
On

ओमान के मस्कट पहुंचने पर INSV कौंडिन्य को वॉटर कैनन सैल्यूट मिला। 29 दिसंबर 2025 को पोरबंदर, गुजरात से शुरू हुआ 18 दिनों का सफर बीती 14 जनवरी को ओमान के मस्कट में खत्म हुआ। इंडियन नेवी का INSV कौंडिन्य जहाज 2000 साल पुरानी पाल विधि से निर्मित है। यह भारत-ओमान की गहरी दोस्ती और समुद्री सुरक्षा में दोनों देशों के सहयोग का सम्मान था। इस यात्रा का मकसद भारत की प्राचीन समुद्री विरासत को फिर से पुनर्जीवित करना है। यह जहाज 4 थी- 5 वीं शताब्दी के भारतीय जहाजों के मॉडल पर बना है। जहाज बिना कील या धातु के लकड़ी के तख्तों को रस्सियों से सिलकर तैयार किया गया। कहां से आया कौंडिन्य का आइडिया? चलिए आपको इसके पूरे सफर के बारे में आपको बताते हैं।

प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) के सदस्य संजीव सान्याल ने ही INSV कौंडिन्य मिशन का वैचारिक आधार तैयार किया और इस प्रस्ताव को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समक्ष रखा। एक प्रखर इतिहासकार होने के नाते सान्याल ने भारत की समुद्री चेतना को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता पर बल दिया। उनका मानना था कि भारत को अपनी प्राचीन समुद्री शक्ति को पहचानते हुए उसे आधुनिक संदर्भों में पुनः स्थापित करना चाहिए। उन्होंने इस मिशन को केवल एक नौसैनिक यात्रा नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक और रणनीतिक वापसी के रूप में परिभाषित किया।
‘कौंडिन्य’ नाम का चयन भी संजीव सान्याल की गहरी ऐतिहासिक समझ का परिणाम है। उन्होंने इस मिशन को प्रधानमंत्री के नारी शक्ति विज़न से जोड़ने में अहम भूमिका निभाई। नौसेना और सरकार के बीच सेतु बनते हुए उन्होंने दो महिला अधिकारियों द्वारा विश्व परिक्रमा के कठिन लक्ष्य को राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक बनाया। उनके मार्गदर्शन में यह मिशन भारत की सॉफ्ट पावर का प्रभावी माध्यम बनकर उभरा, जिसने वैश्विक मंच पर भारत की आधुनिक सोच और क्षमता को दर्शाया।

यह यात्रा केवल सैन्य अभ्यास नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक पुल है। सदियों पहले भारतीय नाविक मसाले, वस्त्र और संस्कृति लेकर अरब देशों तक जाते थे। आज INSV कौंडिन्य उन्हीं समुद्री मार्गों पर शांति, मित्रता और महिला सशक्तिकरण का संदेश लेकर आगे बढ़ा है। यह मिशन दर्शाता है कि भारत अपनी पुरानी मित्रताओं को नए युग में और अधिक सशक्त बनाना चाहता है।

INSV कौंडिन्य पूरी तरह स्वदेशी नौका है, जिसे भारत में ही डिजाइन और निर्मित किया गया है। यह ‘मेक इन इंडिया’ की सफलता का प्रमाण है। इसकी मजबूती और संतुलन इसे दुनिया के सबसे चुनौतीपूर्ण समुद्री मार्गों—जैसे रोरिंग फोर्टीज—को पार करने में सक्षम बनाते हैं और आत्मनिर्भर भारत का संदेश देते हैं।

इस मिशन के लिए महिला अधिकारियों का चयन एक लंबी और कठोर प्रक्रिया के बाद किया गया। लेफ्टिनेंट कमांडर वर्तिका जोशी के पहले सफल अभियान के अनुभवों के आधार पर इस बार दो नई महिला अधिकारियों को मानसिक और शारीरिक रूप से विशेष प्रशिक्षण दिया गया। महीनों तक उन्हें तूफानों, तकनीकी चुनौतियों और समुद्र के एकाकीपन से जूझने के लिए कमांडो स्तर की ट्रेनिंग दी गई।

यात्रा के दौरान महिला अधिकारी समुद्र की सेहत, प्रदूषण और समुद्री जीवों से संबंधित डेटा भी एकत्र कर रही हैं, जो जलवायु परिवर्तन के अध्ययन में वैज्ञानिकों के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगा। इस प्रकार यह मिशन साहस, विज्ञान और पर्यावरण संरक्षण का एक सशक्त संगम बन गया है।

समुद्र की लहरें कभी स्थिर नहीं रहतीं। इस यात्रा में INSV कौंडिन्य को कई बार 20–30 फीट ऊंची लहरों और तेज़ तूफानी हवाओं का सामना करना पड़ा। बिना इंजन, केवल हवा के सहारे आगे बढ़ना एक असाधारण कौशल की मांग करता है। महिला अधिकारियों का धैर्य और आत्मविश्वास यह सिद्ध करता है कि कठोर प्रशिक्षण और दृढ़ संकल्प से हर चुनौती पर विजय पाई जा सकती है।

सामने आएंगी समुद्री परंपराएं  

यह पोत भारत के पुराने समुद्री रास्तों को फिर से जिंदा करेगा। यह जहाज हिंद महासागर की दुनिया से भारत के हजारों साल पुराने रिश्तों को दिखाएगा। इस यात्रा से भारत की पुरानी पोत बनाने की कला और समुद्री परंपराएं फिर से सामने आएंगी।

ऐसे हुआ जहाज का नामकरण

जहाज का नाम पहली सदी के प्रसिद्ध भारतीय नाविक कौंडिन्य के नाम पर रखा गया है, उन्होंने प्राचीन काल में भारत से दक्षिण पूर्व एशिया तक की यात्रा की थी। यह जहाज भारत की समुद्री खोज, व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान की परंपरा का प्रतीक माना जा रहा है। 

जहाज की विशेषताएं

65 फुट लंबी इस नौका का निर्माण पारंपरिक सिलाई तकनीक से किया गया है, जिसमें प्राकृतिक सामग्रियों और सदियों पुरानी विधियों का उपयोग किया गया है। भारत के प्राचीन जहाज निर्माण कौशल को दुनिया के सामने लाने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने साल 2023 में प्रोजेक्ट को मंजूरी दी थी। जिसके बाद संस्कृति मंत्रालय, भारतीय नौसेना और गोवा की निजी बोट बिल्डर कंपनी होड़ी इनोवेशंस के बीच त्रिपक्षीय समझौता हुआ। जहाज को फरवरी 2025 में गोवा में लॉन्च किया गया।

INSV ‘कौंडिन्य’ का डिजाइन अजंता गुफाओं की 5 वीं सदी की एक पेंटिंग पर आधारित है। गोवा की एक कंपनी ने करीब 2000 साल पुरानी टांका पद्धति से इस जहाज का निर्माण किया है। लकड़ी के तख्तों से बने इस जहाज को नारियल के रेशे से सिला गया है। जहाज में कहीं भी कीलों का इस्तेमाल नहीं हुआ है। जहाज में न तो इंजन है और न ही जीपीएस। इसमें चौकोर सूती पाल और पैडल लगे हैं। यह पूरी तरह हवा के सहारे, कपड़े के पाल (सढ़) से चलता है। इस प्रोजेक्ट की कल्पना संजीव सान्याल ने की थी। स्वदेशी रूप से बने इस जहाज के पालों पर गंडभेरुंड और सूर्य के प्रतीक हैं। आगे की ओर सिंह याली की आकृति उकेरी गई है, जबकि डेक पर हड़प्पा शैली का प्रतीकात्मक पत्थर का लंगर लगाया गया है।

कमांडर विकास शेओरान इस अभियान के कप्तान थे, जबकि कमांडर वाई हेमंत कुमार अभियान के प्रभारी अधिकारी के रूप में कार्यरत थे। हेमंत कुमार परियोजना की अवधारणा से ही इससे जुड़े हुए हैं। दल में चार अधिकारी और 13 नौसैनिक शामिल थे। मस्कट के सुल्तान काबूस बंदरगाह पहुंचने पर कौंडिन्य को वाटर सैल्यूट (जल सलामी) दिया गया। इस पर कोई कमरा नहीं है। क्रू मेंबर्स स्लीपिंग बैग में सोते थे। वहां बिजली की भी व्यवस्था नहीं थी। अन्य जहाजों को चेतावनी देने के लिए क्रू के पास सिर्फ हेडलैंप्स थे, जो अपने सिर पर लगाकर रखते थे। क्रू मेंबर्स ने 18 दिन खिचड़ी और अचार खाकर बिताए।