संपादकीय : स्पष्ट सीख
आईपैक छापे के मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिया गया अंतरिम आदेश उचित विधायी हस्तक्षेप और संघीय ढांचे, एजेंसियों की भूमिका तथा चुनावी राजनीति के जटिल रिश्तों पर एक सख्त टिप्पणी है। अदालत की यह टिप्पणी कि ईडी की याचिकाओं से उठे गंभीर सवालों की जांच नहीं हुई तो “देश में अराजकता” का संदेश जाएगा, बताती है कि अदालत राज्य सरकारों द्वारा केंद्रीय एजेंसियों के कामकाज को प्रशासनिक या राजनीतिक तरीकों से बाधित करने को हल्के में नहीं ले रही।
कोर्ट परिसर में टीएमसी समर्थकों की भीड़ जुटाना भी लोकतांत्रिक मर्यादाओं के सर्वथा विपरीत हैं। न्यायालय जनदबाव से नहीं, विधि से चलता है। ऐसा आचरण पार्टी की संवैधानिक समझ पर सवाल खड़े करता है। जब सरकारी तंत्र और राजनीतिक शक्ति एक ही व्यक्तित्व में निहित हो, तब यह दलील कि मुख्यमंत्री वहां पार्टी अध्यक्ष के रूप में गईं, कानूनी तौर पर कमजोर है। ईडी अधिकारियों पर दर्ज एफआईआर पर रोक, राज्य सरकार को नोटिस और जवाब तलबी इत्यादि टीएमसी के लिए तत्काल राजनीतिक असहजता पैदा करते हैं। हालांकि ईडी की टाइमिंग पर भी सवाल स्वाभाविक हैं।
पांच वर्षों से लंबित जांच में ऐन चुनावों के पहले छापे क्यों? एजेंसी को यह स्पष्ट करना होगा कि नई सामग्री, हवाला चैनल और कैश ट्रांसफर जैसी कई ताजा कड़ियों का मिलान ही इस देरी और कार्रवाई का आधार बनी। ईडी के दुरुपयोग की जनधारणा को नजरअंदाज न करते हुए अंतिम सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट को दोनों वास्तविकताओं एजेंसियों की स्वायत्तता और उनके कथित दुरुपयोग के बीच संतुलन साधना होगा। राजनीतिक प्रश्न यह है कि क्या इससे ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की मुसीबतें बढ़ेंगी या वे इसे “विपक्षी प्रताड़ना” का मुद्दा बनाकर लाभ उठा पाएंगी? चुनाव अंततः जनमत तय करेगा, पर बंगाल की राजनीति का इतिहास बताता है कि ममता बनर्जी अक्सर पीड़ित-कार्ड को प्रभावी ढंग से भुनाती रही हैं।
परंतु इस बार मामला केवल बयानबाजी का नहीं, बल्कि अदालती प्रक्रियाओं, नोटिस और एजेंसियों की विकट और जटिल जांच का है यह प्रक्रिया दीर्घकाल में उनके लिये राजनीतिक जोखिम को बढ़ाता है। ममता बनर्जी के आरोप कि आईपैक के पास एसआईआर से जुड़ा पार्टी का चुनावी डेटा था, ईडी उसे जब्त करने पहुंची या भाजपा द्वारा पड़ोसी राज्यों से लोगों को लाकर मतदान कराने की साजिश अथवा चुनाव आयोग भाजपा के इशारे पर एआई की मदद से मतदाता सूची से नाम हटा रहा है, राजनीतिक रूप से तीखे हो सकते हैं, पर कानूनी कसौटी पर ठोस सबूत के बिना प्रमाण के ये आरोप समर्थकों को प्रभावित भले करें, लेकिन अदालत में टिकना कठिन है।
तथ्यात्मक परीक्षण में मात्र आशंका पर्याप्त नहीं। हां, कोयला घोटाले की रकम सत्तारूढ़ दल के वरिष्ठ नेताओं तक पहुंचने के दावे यदि प्रमाण सहित सामने आते हैं, तो राजनीति और तेज होगी अन्यथा यह सियासी पलटवार जोखिम से भरा है। अब अंतिम अदालती फैसला चाहे जो हो, यह मामला बंगाल के आगामी विधानसभा चुनावों और उसके बाद भी राजनीतिक विमर्श में बना रहेगा। गैर-भाजपाई राज्यों के लिए सीख स्पष्ट है कि कानूनी लड़ाई को सड़क और भीड़ की राजनीति से अलग रखें, संस्थानों से टकराव में संयम बरतें और हर आरोप को दस्तावेजी प्रमाण से जोड़ें।
