संपादकीय: प्रतिबद्ध प्रयास आवश्यक 

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Published By Monis Khan
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प्रधानमंत्री ने एक बार फिर घुसपैठियों का मुद्दा चुनावी विमर्श के केंद्र लाते हुए पश्चिम बंगाल और असम को घुसपैठियों से मुक्त कराने का आह्वान किया है। देश के लिए इस महत्वपूर्ण मुद्दे को प्रधानमंत्री द्वारा लाल किले से लेकर, तमाम चुनावी जनसभाओं में भी दोहराया गया है, इसके समाधान की प्रतिबद्धता भी व्यक्त की गई है, निस्संदेह इस ओर कुछ काम भी हुआ होगा, लेकिन प्रश्न यह है कि इसे अब तक ठोस अंजाम क्यों नहीं मिल पाया।

 भारत में अवैध घुसपैठ की समस्या केवल सीमाओं तक सीमित विषय नहीं रह गई है, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा, सामाजिक संतुलन, लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं और आर्थिक संसाधनों के दुरुपयोग से जुड़ा गंभीर प्रश्न है। घुसपैठ का असर बहुआयामी है। सीमावर्ती राज्यों में जनसांख्यिकीय बदलाव, सरकारी योजनाओं का दबाव, स्वास्थ्य और शिक्षा संसाधनों का अनुचित उपयोग, स्थानीय लोगों की आजीविका पर असर और सामाजिक तनाव, ये सब इसके प्रत्यक्ष परिणाम हैं। 

इससे भी अधिक चिंताजनक है फर्जी वोटर आईडी, आधार कार्ड जैसे दस्तावेजों के जरिए चुनावी प्रक्रिया में हस्तक्षेप, नकली करेंसी, नशीली दवाओं की तस्करी और आतंकी स्लीपर सेल की आशंकाएं। एनडीए सरकार पिछले 11 वर्षों से सत्ता में है। यह प्रश्न स्वाभाविक है कि यदि सरकार वास्तव में प्रतिबद्ध है, तो बिहार, पश्चिम बंगाल और असम जैसे राज्यों में इसके ठोस परिणाम क्यों नहीं दिखते? कम से कम जो भाजपा शासित राज्य हैं, वह घुसपैठ मुक्त क्यों नहीं है? क्या राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी है या फिर यह मुद्दा चुनावी लाभ के लिए इसे जीवित रखा गया है, जैसा कि विपक्ष आरोप लगाता है? 

यूपीए सरकार के अनुसार 2005-2013 के बीच 88,792 अवैध अप्रवासियों को निर्वासित किया गया, जबकि 2014-2019 के बीच यह संख्या घटकर 2,566 रह गई। 2019 के बाद कोई विश्वसनीय आधिकारिक आंकड़ा सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है। यदि सरकार के पास अद्यतन और पारदर्शी डेटा नहीं है, तो “घुसपैठिए को चुन-चुन कर बाहर निकालने” की घोषणा कितनी व्यावहारिक है? बांग्लादेशी अवैध प्रवासियों की आधिकारिक संख्या आज तक सार्वजनिक क्यों नहीं है, जिसके चलते पश्चिम बंगाल में 50-57 लाख घुसपैठियों के दावे की प्रामाणिक आज भी सवालों के घेरे में है। 

इसके अलावा क्या घुसपैठियों के प्रवेश मार्ग, धर्म, राज्यों में वितरण इन सबका समेकित, सत्यापित ब्योरा हमारे पास है? यदि नहीं, तो कार्रवाई कैसे होगी? असम में एनआरसी जैसा बड़ा और विवादास्पद अभ्यास हुआ, लेकिन अंतिम सूची आने के बाद निर्णायक कार्रवाई क्यों नहीं हुई? घुसपैठ रोकने की जिम्मेदारी राज्यों के साथ गृह मंत्रालय, सीमा सुरक्षा बल, विदेश मंत्रालय और पड़ोसी देशों के साथ कूटनीति पर भी है, इनकी जवाबदेही कब तय होगी? यूपी में लागू डिटेक्ट, डिलीट, डीपोर्ट वाली ‘थ्री-डी’ नीति और बिहार में नोटिस जैसी प्रक्रिया असम और पश्चिम बंगाल में क्यों नहीं? बेशक समाधान न भाषणों में है, न ही डर के नैरेटिव में। सरकार को पारदर्शी आंकड़े, समयबद्ध कार्ययोजना, अंतर-मंत्रालयी समन्वय, सीमाई प्रबंधन की मजबूती और मानवाधिकार-सम्मत, लेकिन सख्त कार्रवाई के ठोस कदम उठाने होंगे। तभी प्रधानमंत्री का आह्वान चुनावी नारा नहीं, राष्ट्रीय नीति के तौर पर स्थापित हो सकेगा।