वसंत पंचमी : प्रकृति के नवोन्मेष और ज्ञान की आराधना का पर्व

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Published By Anjali Singh
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वसंत पंचमी भारतीय संस्कृति में एक बहुत ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाने वाला त्योहार है, जिसमें हमारी परंपरा, भौगौलिक परिवर्तन, सामाजिक कार्य तथा आध्यात्मिक पक्ष सभी का सम्मिश्रण है। हिन्दू पंचांग के अनुसार माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को वसंत पंचमी का त्यौहार मनाया जाता है। वास्तव में भारतीय गणना के अनुसार वर्ष भर में पड़ने वाली छः ऋतुओं (वसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत, शिशिर) में वसंत को ऋतुराज अर्थात सभी ऋतुओं का राजा माना गया है और वसंत पंचमी के दिन को वसंत ऋतु का आगमन माना जाता है, इसलिए वसंत पंचमी ऋतु परिवर्तन का दिन भी है, जिस दिन से प्राकृतिक सौंदर्य निखारना शुरू हो जाता है। पेड़ों पर नई पत्तिया कोपले और कालिया खिलना शुरू हो जाती हैं, पूरी प्रकृति एक नवीन ऊर्जा से भर उठती है। साथ ही यह त्योहार मां सरस्वती की पूजा और ज्ञान, संगीत, कला एवं विद्या के प्रति समर्पण का प्रतीक है। -डॉ. विपिन शर्मा, ज्योतिषाचार्य

वसंत पंचमी को विशेष रूप से सरस्वती जयंती के रूप में मनाया जाता है। यह माता सरस्वती का प्राकट्योत्सव है, इसलिए इस दिन विशेष रूप से माता सरस्वती की पूजा उपासना कर उनसे विद्या बुद्धि प्राप्ति की कामना की जाती है। विद्यार्थियों के लिए वसंत पंचमी का त्योहार बहुत विशेष होता है। इस दिन पीले वस्त्र पहनने और खिचड़ी बनाने और बांटने की प्रथा भी प्रचलित है, तो इस दिन बसंत ऋ तु के आगमन होने से कई स्थानों में आकाश में रंगीन पतंगें उड़ने की परंपरा भी बहुत दीर्घकाल से प्रचलन में है। वसंत पंचमी के दिन का एक और विशेष महत्व भी है। वसंत पंचमी को मुहूर्त शास्त्र के अनुसार एक स्वयं सिद्ध मुहूर्त और अनसूझ साया भी माना गया है अर्थात इस दिन कोई भी शुभ मंगल कार्य करने के लिए पंचांग शुद्धि की आवश्यकता नहीं होती। इस दिन नींव पूजन, गृह प्रवेश, वाहन खरीदना, व्यापार आरंभ करना, सगाई और विवाह आदि मंगल कार्य किए जा सकते हैं।

ज्ञान की देवी सरस्वती

माता सरस्वती को ज्ञान, संगीत, कला, विज्ञान और शिल्प-कला की देवी माना जाता है। भक्त लोग, ज्ञान प्राप्ति और सुस्ती, आलस्य एवं अज्ञानता से छुटकारा पाने के लिए, आज के दिन देवी सरस्वती की उपासना करते हैं। आज के दिन शिशुओं को पहला अक्षर लिखना सिखाया जाता है। दूसरे शब्दों में वसंत पंचमी का दिन विद्या आरंभ करने के लिए काफी शुभ माना जाता है, इसीलिए माता-पिता आज के दिन शिशु को माता सरस्वती के आशीर्वाद के साथ विद्या आरंभ कराते हैं। सभी विद्यालयों में वसंत के दिन सुबह के समय माता सरस्वती की पूजा की जाती है।

शुभ कार्यों के लिए उपयुक्त दिन

वसंत पंचमी का दिन हिन्दु कैलेंडर में पंचमी तिथि को मनाया जाता है। जिस दिन पंचमी तिथि सूर्योदय और दोपहर के बीच में व्याप्त रहती है, उस दिन को सरस्वती पूजा के लिए उपयुक्त माना जाता है। हिन्दु कैलेंडर में सूर्योदय और दोपहर के मध्य के समय को पूर्वाह्न के नाम से जाना जाता है। ज्योतिष विद्या में पारंगत व्यक्तियों के अनुसार वसंत पंचमी का दिन सभी शुभ कार्यों के लिए उपयुक्त माना जाता है। इसी कारण से वसंत पंचमी का दिन अबूझ मुहूर्त के नाम से प्रसिद्ध है और नवीन कार्यों की शुरुआत के लिए उत्तम माना जाता है। वसंत पंचमी के दिन किसी भी समय सरस्वती पूजा की जा सकती है, परंतु पूर्वाह्न का समय पूजा के लिए श्रेष्ठ माना जाता है। सभी विद्यालयों और शिक्षा केन्द्रों में पूर्वाह्न के समय ही सरस्वती पूजा कर माता सरस्वती का आशीर्वाद ग्रहण किया जाता है।

वसंत पंचमी कथा 

सृष्टि के प्रारंभिक काल में भगवान विष्णु की आज्ञा से ब्रह्मा ने जीवों, खासतौर पर मनुष्य योनि की रचना की। अपनी सर्जना से वे संतुष्ट नहीं थे। उन्हें लगता था कि कुछ कमी रह गई है, जिसके कारण चारों ओर मौन छाया रहता है। विष्णु से अनुमति लेकर ब्रह्मा ने अपने कमंडल से जल छिड़का, पृथ्वी पर जलकण बिखरते ही उसमें कंपन होने लगा। इसके बाद वृक्षों के बीच से एक अद्भुत शक्ति का प्राकट्य हुआ। यह प्राकट्य एक चतुर्भुजी सुंदर स्त्री का था, जिसके एक हाथ में वीणा तथा दूसरा हाथ वर मुद्रा में था। अन्य दोनों हाथों में पुस्तक एवं माला थी। ब्रह्मा ने देवी से वीणा बजाने का अनुरोध किया। जैसे ही देवी ने वीणा का मधुरनाद किया, संसार के समस्त जीव-जंतुओं को वाणी प्राप्त हो गई। जलधारा में कोलाहल व्याप्त हो गया। पवन चलने से सरसराहट होने लगी। तब ब्रह्मा ने उस देवी को वाणी की देवी सरस्वती कहा। 

सरस्वती को बागीश्वरी, भगवती, शारदा, वीणावादनी और वाग्देवी सहित अनेक नामों से पूजा जाता है। ये विद्या और बुद्धि प्रदाता हैं। संगीत की उत्पत्ति करने के कारण ये संगीत की देवी भी हैं। वसंत पंचमी के दिन को इनके जन्मोत्सव के रूप में भी मनाते हैं। ऋ ग्वेद में भगवती सरस्वती का वर्णन करते हुए कहा गया है- प्रणो देवी सरस्वती वाजेभिर्वजिनीवती धीनामणित्रयवतु। अर्थात ये परम चेतना हैं। सरस्वती के रूप में ये हमारी बुद्धि, प्रज्ञा तथा मनोवृत्तियों की संरक्षिका हैं। हम में जो आचार और मेधा है, उसका आधार भगवती सरस्वती ही हैं। इनकी समृद्धि और स्वरूप का वैभव अद्भुत है। पुराणों के अनुसार श्रीकृष्ण ने सरस्वती से ख़ुश होकर उन्हें वरदान दिया था कि वसंत पंचमी के दिन तुम्हारी भी आराधना की जाएगी और यूं भारत के कई हिस्सों में वसंत पंचमी के दिन विद्या की देवी सरस्वती की भी पूजा होने लगी, जो कि आज तक जारी है।

 

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