लोकायन लावणी: महाराष्ट्र की जीवंत लोक कला

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Published By Anjali Singh
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लावणी अपने जोरदार लयबद्ध अंदाज़ के कारण भारत के सबसे लोकप्रिय लोक नृत्यों में से एक है। यह महाराष्ट्र में विशेष रूप से प्रसिद्ध है और इसमें संगीत, गीत और नृत्य का अनूठा मिश्रण देखने को मिलता है। लावणी की पहचान इसकी तेज़-तर्रार ढोलक की ताल और नर्तकियों के नटखट, आकर्षक हाव-भाव से होती है। यह नृत्य दक्षिणी मध्य प्रदेश में भी प्रचलित है और मराठी लोक रंगमंच के विकास में इसका बड़ा योगदान माना जाता है। लावणी को एक रोमांटिक गीत के रूप में भी देखा जाता है, जिसमें एक महिला प्रेमी के आने का इंतजार करती है और अपनी भावनाओं को गीत के माध्यम से व्यक्त करती है।

नृत्य का इतिहास

लावणी शब्द का मूल “लावण्य” शब्द से माना जाता है, जिसका अर्थ है सौंदर्य। इसमें नारी की सुंदरता, शक्ति और भावनात्मक अभिव्यक्ति का सुंदर मेल दिखाई देता है। हालांकि लावणी की उत्पत्ति की सटीक तिथि स्पष्ट नहीं है, लेकिन माना जाता है कि यह एक मनोरंजक कला के रूप में विकसित हुई थी और युद्धग्रस्त समय में सैनिकों के मनोबल को बढ़ाने के लिए भी इसका उपयोग किया जाता था। 18 वीं और 19 वीं शताब्दी में महाराष्ट्र युद्धों से जूझ रहा था, और उस समय लावणी का महत्व बढ़ गया। यह नृत्य थके हुए सैनिकों के मनोरंजन का प्रमुख स्रोत बन गया। पेशवा शासन के दौरान लावणी को शाही संरक्षण मिला और यह और भी अधिक लोकप्रिय हुई। मराठी कवि जैसे माननीय बाला, रामजोशी, प्रभाकर आदि ने इसे नई ऊँचाइयों पर पहुँचाया और इस कला को साहित्यिक तथा सांस्कृतिक रूप से समृद्ध किया।

लावणी का प्रदर्शन

लावणी का प्रदर्शन एक संगीत-संवाद जैसा होता है, जिसमें गीत, नृत्य, ताल और परंपरा का संयोजन होता है। ढोलक की तेज़ धुनों के साथ नर्तकियाँ अपने लयबद्ध कदमों से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देती हैं। लावणी के गीतों में समाज, धर्म, राजनीति, और रोमांस जैसे विषयों को सहजता से प्रस्तुत किया जाता है। महाराष्ट्र की कई जातियाँ, जैसे महार, कोल्हाती, कुंभार और मतंग, लावणी के प्रमुख कलाकार माने जाते हैं।

लावणी मुख्यतः दो प्रकार की होती है—फडाची लावणी और बैठकी लावणी। फडाची लावणी बड़े मंच पर नाटकीय रूप में प्रस्तुत की जाती है, जबकि बैठकी लावणी निजी समारोहों में, अधिक शास्त्रीय शैली में गाई जाती है।

नर्तकियों की वेशभूषा

लावणी की नर्तकियां 9 गज की नौवारी साड़ी पहनती हैं और अपने बालों को सख्ती से बांधकर रखती हैं। वे भारी गहनों जैसे हार, झुमके, पायल, कमरपट्टा, चूड़ियां आदि से सजती हैं। लावणी में बिंदी का भी विशेष महत्व है, जो नृत्य की सौंदर्यात्मकता को और बढ़ाती है।