संपादकीय : महत्वाकांक्षा और चुनौतियां
उत्तर प्रदेश हेल्थ केयर और मेडिकल टेक्नोलॉजी का हब बनने की ओर है, मुख्यमंत्री का दावा पिछले एक दशक में इस क्षेत्र में किए गए ठोस प्रयासों और ठोस नीतिगत पहलों पर आधारित है। हालांकि देश के सर्वाधिक आबादी वाले राज्य के लिए यह लक्ष्य महत्वाकांक्षी होने के साथ चुनौतीपूर्ण भी है। पिछले दस वर्षों में उत्तर प्रदेश ने चिकित्सा एवं स्वास्थ्य क्षेत्र में कई उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की हैं।
आयुष्मान भारत-प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना के प्रभावी क्रियान्वयन से करोड़ों परिवारों को सार्वभौमिक स्वास्थ्य बीमा का लाभ मिला। एम्स और तमाम नए अस्पताल शुरू हुए, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य के क्षेत्र में सुधार, टीकाकरण कवरेज का विस्तार और स्वच्छ भारत मिशन के तहत शौचालय निर्माण ने मृत्यु दर घटाने में मदद की है। आज नीति आयोग के स्वास्थ्य सूचकांक में राज्य का सातवें स्थान पर पहुंचना इन्हीं सुधारों को दर्शाता है। हालांकि आगे चुनौतियां भी कम नहीं हैं। जनसंख्या का दबाव, डॉक्टरों व नर्सों की कमी, क्षेत्रीय असंतुलन व ग्रामीण गरीबी।
इनसे निपटने के लिए मेडिकल व पैरामेडिकल शिक्षा का विस्तार, ग्रामीण सेवा को प्रोत्साहन, दवा व उपकरणों की सस्ती उपलब्धता और समुदाय आधारित स्वास्थ्य जागरूकता अभियानों को अभी और मजबूत करना होगा। संक्रामक और गैर-संक्रामक रोगों के दोहरे बोझ से निपटने के लिए एक उत्तरदायी, डेटा-आधारित और समावेशी स्वास्थ्य प्रणाली अभी निर्माणाधीन अवस्था में ही है। ऐसे में भविष्य की ओर देखें तो सरकार की योजनाएं स्वास्थ्य सेवाओं, मेडिकल रिसर्च और तकनीक को एक साथ आगे बढ़ाने पर केंद्रित होनी चाहिए।
मेडिकल डिवाइस पार्क और बल्क ड्रग फार्मा पार्क की स्थापना से दवाइयों और मेडिकल उपकरणों के घरेलू उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा, आयात पर निर्भरता घटेगी, रोजगार और निवेश के अवसर भी सृजित होंगे। मेडिकल कॉलेजों की संख्या बढ़ाना, पीपीपी मॉडल पर सुपर स्पेशिएलिटी अस्पतालों को प्रोत्साहन देना और हेल्थ स्टार्टअप्स के लिए अनुकूल वातावरण बनाना भी इसी रणनीति का हिस्सा है। यूपी-आईएमआरएएस जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म से क्लीनिकल ट्रायल व मेडिकल रिसर्च से जुड़े अनुमोदनों को सरल, पारदर्शी और तेज बना है और शोधकर्ताओं और डॉक्टरों को नौकरशाही बाधाओं से राहत मिली तथा निवेशकों को समयबद्ध और भरोसेमंद प्रक्रियाएं भी।
यह प्लेटफॉर्म उत्तर प्रदेश को रिसर्च-फ्रेंडली राज्य बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है। डिजिटल हेल्थ के क्षेत्र में भी प्रगति उल्लेखनीय है। हालांकि इनसे जुड़ी पहलों का लाभ दूरदराज ग्रामीण क्षेत्रों तक समान रूप से पहुंचना अभी बाकी है। सूबा अपने सकल घरेलू उत्पाद का लगभग डेढ़ प्रतिशत स्वास्थ्य पर व्यय करता है, यह कम है। इसे कम से कम 2.5 प्रतिशत तक बढ़ाना आवश्यक है। प्रति व्यक्ति स्वास्थ्य व्यय भी अभी अपेक्षाकृत कम है, बुनियादी ढांचे, मानव संसाधन और प्राथमिक स्वास्थ्य पर निवेश बढ़ाकर इसे सुधारा जा सकता है। यदि प्रदेश को अपने प्रतिद्वंद्वी राज्यों से प्रतिस्पर्धा करनी है, तो गुणवत्ता और समानता विशेष ध्यान देना होगा। हेल्थ केयर और मेडिकल टेक्नोलॉजी का हब बनने से आम जनता को बेहतर, सस्ती और सुलभ सेवाएं मिलेंगी और यही किसी भी स्वास्थ्य नीति की अंतिम कसौटी है। फिलहाल रणनीतिक योजनाओं और मुख्यमंत्री की राजनीतिक इच्छाशक्ति से सूबा इस लक्ष्य के करीब पहुंचता दिखता है।
