मुझे ज़माने के साथ चलना है
मुझे झूठ बोलना है अपने सबसे नज़दीक लोगों से उन सबसे जिनका मुझ पर यक़ीन है अपने क़सीदे मैं ख़ुद ही गढ़ूँगा झूठे क़सीदे एकदम कोरे झूठे मंदिर में ईश्वर से भी झूठ बोलना है , जब झूठ ही हर ओर हो तब सच क्या बोलना जब सबका लक्ष्य किसी का हक़ मारना ही हो …
मुझे झूठ बोलना है
अपने सबसे नज़दीक लोगों से
उन सबसे जिनका मुझ पर यक़ीन है
अपने क़सीदे मैं ख़ुद ही गढ़ूँगा
झूठे क़सीदे एकदम कोरे झूठे
मंदिर में ईश्वर से भी झूठ बोलना है ,
जब झूठ ही हर ओर हो तब सच क्या बोलना
जब सबका लक्ष्य किसी का हक़ मारना ही हो
तब सच क्या बोलना
जब टीवी खोलते ही झूठ- झूठ हो
अखबार थोड़े से सच में ढेर सारा झूठ हो
तब सच क्या बोलना
मुझे झूठ बोलना है
पर मैं झूठ क्यों बोलना चाहता हूँ ?
जबकि कुछ है नहीं पास मेरे छुपाने को
मैं जमाने के साथ चलना चाहता हूँ
इसलिये मैं झूठ बोलना चाहता हूँ
सिर्फ़ झूठ ..
सच बोल दूँगा कभी-क़भार
आखिर सच्चा होने का भ्रम भी तो ज़िंदा रखना है भीतर अपने।
-वीरेंद्र ओझा
