चाइनीज मांझा बना पक्षियों की मौत की डोर, चिड़ियाघर प्रशासन और वन विभाग ने की अपील, पतंगबाजी करें, लेकिन...

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Published By Muskan Dixit
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लखनऊ, अमृत विचार: लखनऊ चिड़ियाघर में चाइनीज मांझे से घायल हो रहे बेजुबान पक्षियों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। आए दिन कोई न कोई पक्षी पतंग के मांझे में फंसकर गंभीर रूप से घायल हो रहा है। यह मांझा पक्षियों की गर्दन से लेकर पंख तक काट देता है, जिससे उनकी उड़ने की क्षमता लगभग समाप्त हो जाती है और कई मामलों में उनकी जान चली जाती है। चिड़ियाघर प्रशासन ने दर्शकों और आसपास के इलाकों में रहने वाले लोगों से अपील की है कि वे चाइनीज मांझे का इस्तेमाल न करें और बेजुबान पक्षियों को बचाएं। प्रशासन का कहना है कि पक्षियों की संख्या में कमी से पर्यावरण की स्थिरता पर भी प्रतिकूल असर पड़ सकता है। चिड़ियाघर की निदेशक डॉ. अदिति शर्मा ने बताया कि मकर संक्रांति, वसंत पंचमी और गणतंत्र दिवस जैसे पर्वों पर पतंगबाजी का चलन बढ़ जाता है। उन्होंने पेंच लड़ाने वालों से खास अपील करते हुए कहा कि चाइनीज मांझे का प्रयोग न करें। आसमान में उड़ रहे पक्षी इस डोर में फंसकर अपनी जान गंवा रहे हैं।

मकर संक्रांति पर बढ़ीं घटनाएं

मकर संक्रांति के आसपास चाइनीज मांझे से जुड़ी घटनाओं में तेजी देखी गई। 16 जनवरी 2026 को अलीगंज इलाके में एक उल्लू पेड़ पर चाइनीज मांझे में फंसा हुआ मिला। वहीं 15 जनवरी को एक चील और राष्ट्रीय पक्षी मोर चाइनीज मांझे से गंभीर रूप से घायल पाए गए।

हर साल 1000 से 1500 पक्षी बनते हैं शिकार

वन्यजीव संरक्षण से जुड़े लोगों के अनुसार, लखनऊ में हर पर्व पर पतंगबाजी की परंपरा है। इस दौरान चाइनीज मांझा आसमान में उड़ने वाले पक्षियों के लिए जानलेवा साबित होता है। अनुमान है कि हर साल लखनऊ में करीब 1000 से 1500 पक्षी या तो घायल हो जाते हैं या अपनी जान गंवा देते हैं।

वन विभाग की हर रेंज में मामले

लखनऊ में वन विभाग की कुल 10 रेंज हैं। प्रत्येक रेंज में चाइनीज मांझे से हर महीने औसतन 8 से 10 मामले सामने आ रहे हैं। कई पक्षियों के पंख कट जाते हैं तो कई की मौके पर ही मौत हो जाती है।

अस्थायी रेस्क्यू सेंटर बना सहारा

वन विभाग ने विक्रमादित्यमार्ग स्थित हनुमान स्वामी मंदिर के पीछे एक अस्थायी रेस्क्यू सेंटर बनाया है। यहां हर साल चाइनीज मांझे से घायल 90 से 100 पक्षियों को लाया जाता है। सेंटर सदस्य रामतीर्थ यादव के अनुसार उल्लू, कौवा, चील, कबूतर के साथ-साथ राष्ट्रीय पक्षी मोर भी अक्सर इसकी चपेट में आ जाते हैं। प्राथमिक उपचार के बाद इन पक्षियों को चिड़ियाघर भेजा जाता है।

जू में घायल पक्षियों के लिए अलग बाड़ा

चिड़ियाघर में चाइनीज मांझे से घायल पक्षियों के लिए अलग से बाड़ा बनाया गया है। वॉलेंटियर और आम लोग जब घायल पक्षी लेकर आते हैं तो उनका इलाज जू में ही किया जाता है। कम घायल पक्षियों को स्वस्थ होने पर उड़ने के लिए छोड़ दिया जाता है, जबकि ज्यादा घायल पक्षियों को बाड़े में रखकर इलाज किया जाता है। वर्तमान में करीब 20 पक्षियों का उपचार जू में चल रहा है।

2015 से प्रतिबंध, फिर भी जारी खतरा

जानकारी के अनुसार वर्ष 2015 में हाईकोर्ट ने चाइनीज मांझे के इस्तेमाल पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया था। इसके अलावा एजीटी ने प्रतिबंध का उल्लंघन करने पर सात साल तक की कैद और एक लाख रुपये तक जुर्माने का प्रावधान किया था। बावजूद इसके, चाइनीज मांझे की बिक्री और उत्पादन पर पूरी तरह रोक नहीं लग पाई है। इसका खामियाजा बेजुबान पक्षियों को अपनी गर्दन और पंख कटवाकर भुगतना पड़ रहा है।

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