आर्थिक समीक्षा से बाजार गुलजार, 7. 2% वृद्धि का अनुमान, जानिए भारत की GDP में क्या होगा इसका असर
मुंबई। सेंसेक्स और निफ्टी में बृहस्पतिवार को संसद में आर्थिक समीक्षा पेश होने के बाद उछाल आया। आर्थिक समीक्षा में वित्त वर्ष 2026-27 के लिए जीडीपी वृद्धि के 6.8-7.2 प्रतिशत के दायरे में रहने का अनुमान है। बीएसई सेंसेक्स शुरुआती सभी नुकसान से उबरते हुआ 268.58 अंक चढ़कर 82,613.26 अंक पर पहुंच गया। वहीं एनएसई निफ्टी 88.65 अंक की बढ़त के साथ 25,431.40 अंक पर कारोबार कर रहा था।
टाटा स्टील, एक्सिस बैंक, एनटीपीसी, इटर्नल, अदाणी पोर्ट्स और भारतीय स्टेट बैंक के शेयर फायदे में रहे। हालांकि, एशियन पेंट्स, महिंद्रा एंड महिंद्रा, भारत इलेक्ट्रॉनिक्स और मारुति के शेयर में गिरावट आई। एशियाई बाजारों में दक्षिण कोरिया का कॉस्पी, जापान का निक्की 225, चीन का एसएसई कम्पोजिट और हांगकांग का हैंग सेंग बढ़त में रहे।
अमेरिकी बाजार बुधवार को स्थिर बंद हुए थे। अंतरराष्ट्रीय मानक ब्रेंट क्रूड का भाव 1.27 प्रतिशत की बढ़त के साथ 69.32 डॉलर प्रति बैरल रहा। शेयर बाजार के आंकड़ों के मुताबिक, विदेशी संस्थागत निवेशक (एफआईआई) लंबे समय बाद बुधवार को लिवाल रहे और उन्होंने शुद्ध रूप से 480.26 करोड़ रुपये के शेयर खरीदे। घरेलू संस्थागत निवेशकों (डीआईआई) ने भी 3,360.59 रुपये के शेयर खरीदे।
सरकार 4.4 प्रतिशत का राजकोषीय घाटे का लक्ष्य पाने की राह पर अग्रसर
दिल्ली। चालू वित्त वर्ष में राजकोषीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 4.4 प्रतिशत तक सीमित रखने की दिशा में केंद्र सरकार अच्छी प्रगति पर है। संसद में बृहस्पतिवार को पेश आर्थिक समीक्षा 2025-26 में यह बात कही गई। आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि केंद्र सरकार ने राजकोषीय अनुशासन और वृद्धि के लिए टिकाऊ निवेश दोनों को संतुलित किया जिसकी वजह से उसका राजकोषीय मार्ग अन्य से अलग और प्रभावशाली दिखता है।
इस प्रतिबद्धता के चलते इस वर्ष तीन रेटिंग एजेंसियों ने भारत की क्रेडिट रेटिंग को बढ़ाया है। इसके मुताबिक, वित्त वर्ष 2019-20 से 2024-25 के दौरान कुल केंद्रीय व्यय में पूंजीगत खर्च का हिस्सा 12.5 प्रतिशत से बढ़कर 22.6 प्रतिशत हो गया जबकि जीडीपी के अनुपात में प्रभावी पूंजीगत व्यय लगभग 2.6 प्रतिशत से बढ़कर चार प्रतिशत हो गया।
समीक्षा में कहा गया कि राज्यों का राजस्व घाटा बढ़ने के बावजूद केंद्र सरकार ने राज्यों को पूंजीगत व्यय बनाए रखने के लिए विशेष सहायता देकर प्रोत्साहित किया। इसके अलावा कई राज्यों में बिना-शर्त नकद हस्तांतरण का विस्तार राजस्व व्यय बढ़ाने का कारण बना, जिससे राज्यों के स्तर पर राजकोषीय गुंजाइश और सार्वजनिक निवेश प्रभावित हुआ।
आर्थिक समीक्षा कहती है, "वित्त वर्ष में दिखे व्यापक रुझानों के आधार पर केंद्र सरकार राजकोषीय समेकन के अपने निर्धारित मार्ग पर है और वित्त वर्ष 2025-26 में राजकोषीय घाटा लक्ष्य को जीडीपी के 4.4 प्रतिशत पर रखने का लक्ष्य हासिल करने की राह पर है।" नवंबर, 2025 तक, केंद्र सरकार का राजकोषीय घाटा बजट अनुमान का 62.3 प्रतिशत था।
समीक्षा के मुताबिक, बाजारों ने सरकार की राजकोषीय अनुशासन की प्रतिबद्धता को मान्यता दी है, जिससे सरकारी बॉन्ड प्रतिफल घटा है और भारत के सरकारी बॉन्ड पर अमेरिकी बॉन्ड के मुकाबले ब्याज दर का अंतर आधे से अधिक घट गया है। घटता प्रतिफल खुद ही वित्तीय प्रोत्साहन का काम करेगा।
समीक्षा में यह भी बताया गया कि वित्त वर्ष 2024-25 में सरकार ने 4.8 प्रतिशत राजकोषीय घाटे का आंकड़ा हासिल कर 4.9 प्रतिशत के बजट लक्ष्य को भी पार कर लिया। वित्त वर्ष 2020-21 में राजकोषीय घाटा 9.2 प्रतिशत था।
अर्थव्यवस्था मजबूत, अगले वित्त वर्ष में वृद्धि दर 6.8 से 7.2 प्रतिशत रहने का अनुमान
हाल के महीनों में घरेलू मुद्रा के तेज गिरावट के बीच, वित्त वर्ष 2025-26 की आर्थिक समीक्षा में कहा गया है कि रुपये की विनिमय दर में गिरावट भारत की मजबूत आर्थिक बुनियाद को सही रूप से प्रतिबिंबित नहीं करती है और रुपये का क्षमता से कम प्रदर्शन हो रहा है। इसमें कहा गया, ''निश्चित रूप से, इन परिस्थितियों में रुपये की विनिमय दर में गिरावट होना नुकसानदायक नहीं है, क्योंकि यह भारतीय वस्तुओं पर अमेरिकी शुल्क में वृद्धि के प्रभाव को कुछ हद तक कम करता है और कच्चे तेल के आयात की ऊंची कीमतों से उच्च मुद्रास्फीति का कोई खतरा नहीं है।
हालांकि, इससे निवेशकों को संशय जरूर होता है। भारत में निवेश करने को लेकर निवेशकों की अनिच्छा पर ध्यान देने की आवश्यकता है।'' मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन के नेतृत्व में अर्थशास्त्रियों की टीम द्वारा तैयार किए गए इस दस्तावेज में यह भी कहा गया है कि एक मजबूत और स्थिर मुद्रा विकसित भारत के लक्ष्य और वैश्विक प्रभाव को प्राप्त करने के लिए स्वाभाविक रूप से आवश्यक है।
विदेशी पूंजी प्रवाह में कमी के कारण रुपये पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा संसद में पेश समीक्षा में इस बात पर जोर दिया गया है कि भारत अपनी मजबूत वृहद आर्थिक बुनियाद के कारण ज्यादातर देशों की तुलना में अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में है। इसमें कहा गया है कि हाल के वर्षों में नीतिगत सुधारों के प्रभाव से भारत की मध्यम अवधि की वृद्धि क्षमता लगभग सात प्रतिशत तक बढ़ गयी है।
इसके साथ भारत के उदय के भू-राजनीतिक प्रभावों को ध्यान में रखते हुए प्रणाली के स्तर पर गहन संस्थागत क्षमता की आवश्यकता बतायी गयी है। समीक्षा के अनुसार, अनिश्चित वैश्विक वातावरण में भारत को घरेलू वृद्धि को प्राथमिकता देने के साथ-साथ बफर और नकदी पर अधिक जोर देने की आवश्यकता है। इसमें यह भी कहा गया है कि दुनिया में जारी तनाव के बीच वैश्विक माहौल नया रूप ले रहा है।
यह निवेश, आपूर्ति श्रृंखलाओं और वृद्धि की संभावनाओं को प्रभावित करेगा। समीक्षा में मूल्य स्थिति के बारे में कहा गया है कि मुख्य (कोर) मुद्रास्फीति की धीमी गति अर्थव्यवस्था में आपूर्ति पक्ष की स्थितियों के मजबूत होने का संकेत देती है। वर्ष के दौरान देखे गए व्यापक रुझानों के आधार पर, केंद्र सरकार अपने राजकोषीय मजबूती के लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में आगे बढ़ रही है और 2025-26 में इसके लक्ष्य के अनुरूप जीडीपी के 4.4 प्रतिशत पर रहने का अनुमान है।
केंद्र सरकार का राजकोषीय घाटा नवंबर, 2025 तक बजट अनुमान का 62.3 प्रतिशत था। इसमें कहा गया है कि अमेरिका द्वारा लगाए गए शुल्क के बावजूद, वस्तु निर्यात में 2.4 प्रतिशत (अप्रैल-दिसंबर 2025) की वृद्धि हुई, जबकि सेवा निर्यात में 6.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई। अप्रैल-दिसंबर, 2025 के दौरान वस्तु आयात में 5.9 प्रतिशत की वृद्धि हुई।
समीक्षा के अनुसार, जीएसटी में बदलाव और अन्य सुधारों ने वैश्विक अनिश्चितता को एक अवसर में बदल दिया है और अगला वित्त वर्ष समायोजन का वर्ष होगा क्योंकि अर्थव्यवस्था इन बदलावों के अनुकूल होगी। भारत के विभिन्न देशों के साथ किए गए कई मुक्त व्यापार समझौतों को देखते हुए, समीक्षा में कहा गया है कि व्यापार समझौतों की पूरी क्षमता का लाभ उठाने के लिए भारत को प्रतिस्पर्धी रूप से उत्पादन करना होगा।
इसमें कहा गया है कि यूरोप के साथ मुक्त व्यापार समझौता भारत की विनिर्माण प्रतिस्पर्धी क्षमता, निर्यात क्षमता और रणनीतिक क्षमता को मजबूत करेगा। समीक्षा के अनुसार, ज्यादातर वर्षों में, बाहर से भेजा जाने वाला मनी ऑर्डर (रेमिटेंस) सकल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) से अधिक रहा है। यह बाह्य वित्त पोषण के एक प्रमुख स्रोत के रूप में इसके महत्व को बताता है।
परिणामस्वरूप, वित्त वर्ष 2025-26 की पहली छमाही में चालू खाते का घाटा सकल घरेलू उत्पाद के 0.8 प्रतिशत पर बना हुआ है। इसमें यह भी कहा गया है कि निराशावाद की कोई गुंजाइश नहीं है, लेकिन वैश्विक अनिश्चितता के बीच हमें सतर्क रहने की आवश्यकता है। समीक्षा के अनुसार, कई वैश्विक संकटों के सामने आने से भारत के पास वैश्विक व्यवस्था को आकार देने में भूमिका निभाने का अवसर है।
भारत के तेजी से बढ़ते विमानन क्षेत्र पर समीक्षा में कहा गया है कि अनुकूल नीतिगत परिवेश, बढ़ती मांग और स्थिर बुनियादी ढांचा विस्तार के कारण भारत का नागर विमानन क्षेत्र निरंतर विकास के रास्ते पर आगे बढ़ रहा है। समीक्षा में यह भी कहा गया है कि भारत दुनिया के तीसरे सबसे बड़े घरेलू विमानन बाजार के रूप में उभरा है, लेकिन वर्तमान यात्री संख्या देश की क्षमता का केवल एक हिस्सा मात्र है। आर्थिक समीक्षा में स्विगी, जोमैटो जैसी कंपनियों में काम करने वाले अस्थायी कामगारों (गिग) के लिए काम की शर्तों को नया रूप देने वाली नीति का समर्थन किया गया है।
प्राथमिक बाजार 2025-26 में मजबूत रहा, IPO में भारत वैश्विक स्तर पर अग्रणी बना
संसद में बृहस्पतिवार को पेश की गई आर्थिक समीक्षा के अनुसार देश के प्राथमिक पूंजी बाजार ने वित्त वर्ष 2025-26 में शानदार प्रदर्शन किया है। अनिश्चित वैश्विक माहौल के बावजूद भारत आरंभिक सार्वजनिक निर्गम (आईपीओ) के मामले में दुनिया भर में एक अग्रणी देश बनकर उभरा है। समीक्षा में कहा गया कि मजबूत आर्थिक आधार, घरेलू निवेशकों की भारी भागीदारी और सेबी के नियामकीय सुधारों ने बाजारों को मजबूती प्रदान की।
दुनिया भर में व्यापारिक बाधाओं, अस्थिर पूंजी प्रवाह और कंपनियों के असमान मुनाफे के कारण निवेशकों की धारणा प्रभावित हुई। इसके बावजूद भारतीय बाजार अडिग रहे। समीक्षा के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 अबतक वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं और वित्तीय बाजारों के लिए उतार-चढ़ाव भरा रहा है। इसके बावजूद भारत के शेयर बाजारों ने एक नपा-तुला लेकिन जुझारू प्रदर्शन दिखाया। यह प्रदर्शन सहायक सरकारी नीतियों, अनुकूल आर्थिक परिस्थितियों और घरेलू निवेशकों की निरंतर भागीदारी को दर्शाता है।
भारत की मजबूत आर्थिक बुनियाद को सटीक रूप से प्रतिबिंबित नहीं करता रुपये का मूल्यांकन
अमेरिकी मुद्रा के मुकाबले 92 के स्तर तक फिसल चुका रुपया भारत की मजबूत आर्थिक बुनियाद को सही रूप में प्रतिबिंबित नहीं करता। संसद में बृहस्पतिवार को पेश आर्थिक समीक्षा में यह बात कही गई। समीक्षा में कहा गया, "दूसरे शब्दों में रुपया अपनी वास्तविक क्षमता से कम प्रदर्शन कर रहा है।" इसमें यह भी कहा गया कि ऐसे समय में जब महंगाई नियंत्रण में है और आर्थिक वृद्धि का परिदृश्य अनुकूल है, भारत में निवेश के लिए धन लगाने को लेकर निवेशकों की हिचकिचाहट की समीक्षा किए जाने की आवश्यकता है।
भारत अपने भुगतान संतुलन को स्वस्थ बनाए रखने के लिए विदेशी पूंजी प्रवाह पर निर्भर है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा संसद में पेश किए गए बजट-पूर्व दस्तावेज में कहा गया, ''भारतीय रुपये का 2025 में प्रदर्शन कमजोर रहा। भारत वस्तुओं के व्यापार में घाटे में है। सेवाओं और प्रेषण में उसका शुद्ध व्यापार अधिशेष इस घाटे की भरपाई के लिए पर्याप्त नहीं है… जब ये स्रोत कमजोर पड़ते हैं, तो रुपये की स्थिरता प्रभावित होती है।"
बृहस्पतिवार को शुरुआती कारोबार में रुपया अमेरिकी मुद्रा के मुकाबले सर्वकालिक निचले स्तर 92.00 पर पहुंच गया, जो डॉलर की स्थिर मांग और वैश्विक स्तर पर सतर्कता के माहौल के कारण हुआ। बुधवार को रुपया 31 पैसे की गिरावट के साथ 91.99 प्रति डॉलर पर बंद हुआ, जो अब तक का उसका सबसे निचला बंद स्तर है। इससे पहले 23 जनवरी को रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले कारोबार के दौरान 92 के सर्वकालिक निचले स्तर पर पहुंचा था।
बागवानी उत्पादन का शानदार प्रदर्शन, खाद्यान्न , पशुपालन और मत्स्य पालन में ऐतिहासिक वृद्धि
लोकसभा में गुरूवार को वर्ष 2025-26 के लिए पेश हुए आर्थिक सर्वेक्षण में भारत के कृषि और खाद्य प्रबंधन क्षेत्र में पिछले दशक के दौरान व्यापक बदलाव और अभूतपूर्व वृद्धि दर्ज की गई है। भारत विश्व का सबसे बड़ा प्याज उत्पादक देश बन गया है और प्याज के वैश्विक उत्पादन में 25 प्रतिशत का योगदान दे रहा है।
सब्जियों, फलों एवं आलू की पैदावार के मामले में भी भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश बन गया है। ये उपलब्धियां बागवानी क्षेत्र में भारत की मजबूत स्थिति, खाद्य पदार्थों की वैश्विक मांग को पूरा करने में इसकी बढ़ती भूमिका और उच्च मूल्य वाली फसलों के उत्पादन में उपलब्ध अवसरों को दर्शाती हैं।
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