UGC नए नियम पर रोक का यूपी के जिलों में स्वागत : वाराणसी में जश्न, अबीर-गुलाल संग हनुमान चालीसा पाठ
उच्चतम न्यायालय ने बृहस्पतिवार को विश्वविद्यालय परिसर में जाति आधारित भेदभाव को रोकने से संबंधित हालिया यूजीसी समानता विनियमन पर रोक लगा दी और कहा कि ये विनियम प्रथम दृष्टया ''अस्पष्ट'' प्रतीत होते हैं और इनका ''दुरुपयोग'' किए जाने की आशंका है।
शीर्ष अदालत ने मौखिक रूप से टिप्पणी की कि अगर इस मामले में हस्तक्षेप नहीं किया गया तो इसका खतरनाक प्रभाव पड़ेगा और समाज में विभाजन पैदा होगा। उच्चतम न्यायालय का यह आदेश उन विभिन्न याचिकाओं के बाद आया है जिनमें यह दलील दी गई थी कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने जाति-आधारित भेदभाव की ''गैर-समावेशी'' परिभाषा अपनाई है और कुछ श्रेणियों को संस्थागत संरक्षण से बाहर रखा है।
इन नियमों के खिलाफ देश में विभिन्न स्थानों पर विरोध प्रदर्शन हुए जिसमें छात्र समूहों और संगठनों ने इन्हें तत्काल वापस लेने की मांग की। केंद्र और यूजीसी को नोटिस जारी करते हुए प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जे. बागची की पीठ ने सुझाव दिया कि प्रख्यात न्यायविदों की एक समिति द्वारा विनियमों पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए। पीठ ने कहा, ''(केंद्र, यूजीसी को) नोटिस जारी करें और 19 मार्च तक जवाब दाखिल किए जाए।
जौनपुर में सवर्ण संगठनों ने किया स्वागत
उच्चतम न्यायालय द्वारा यूजीसी के नए कानून पर रोक लगाए जाने के बाद जौनपुर में सवर्ण सेना, करणी सेना समेत सभी सवर्ण संगठनों ने फैसले का स्वागत किया है। संगठनों ने कहा कि उन्हें देश की न्यायपालिका पर पूरा भरोसा है और न्यायालय का हर निर्णय उन्हें स्वीकार्य होगा। सवर्ण संगठनों का कहना है कि यूजीसी द्वारा 13 जनवरी 2026 को अधिसूचित नए विनियमों को लेकर देशभर में असंतोष था।
इन नियमों के तहत उच्च शिक्षण संस्थानों में समान अवसर केंद्र, इक्विटी कमेटी और 24 घंटे की हेल्पलाइन अनिवार्य की गई थी, लेकिन "जाति-आधारित भेदभाव" की परिभाषा को लेकर विवाद खड़ा हो गया था। उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जोयमालया बागची की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए नए नियमों के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी है।
अदालत ने स्पष्ट किया है कि जब तक इन प्रावधानों की संवैधानिक वैधता की जांच पूरी नहीं हो जाती, तब तक वर्ष 2012 के पुराने नियम ही लागू रहेंगे। सवर्ण संगठनों ने आरोप लगाया कि नए कानून के विरोध के दौरान जनप्रतिनिधियों की चुप्पी से समाज में नाराजगी बढ़ी।
हालांकि, उच्चतम न्यायालय के स्थगन आदेश के बाद संगठनों ने फिलहाल विरोध रोकने और न्यायालय के अंतिम निर्णय का इंतजार करने की बात कही है। मामले की अगली सुनवाई 19 मार्च को तय की गई है, जिसमें यूजीसी और केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया गया है।
वाराणसी में जश्न, अबीर-गुलाल संग हनुमान चालीसा पाठ
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) की नई नियमावली पर उच्चतम न्यायालय द्वारा रोक लगाए जाने के बाद वाराणसी में विरोध प्रदर्शन जश्न में बदल गया। जिला मुख्यालय पर बीते कई दिनों से चल रहा धरना गुरुवार को कोर्ट के आदेश की खबर मिलते ही उत्सव में तब्दील हो गया। प्रदर्शनकारी एक-दूसरे को अबीर-गुलाल लगाकर बधाइयां देते नजर आए। जश्न के दौरान लोगों ने सामूहिक रूप से हनुमान चालीसा का पाठ भी किया।
पूरे क्षेत्र में जयकारों और नारों के साथ खुशी का माहौल देखा गया। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि यह फैसला सामाजिक समरसता और समानता के पक्ष में है, जिससे समाज में फैल रही असमानता को रोका जा सका है। अधिवक्ता सारिका दुबे ने कहा कि पिछले तीन दिनों से जिला मुख्यालय पर लगातार यूजीसी के नए नियमों के खिलाफ विरोध हो रहा था।
उन्होंने इसे सनातन धर्म और सामाजिक न्याय की जीत बताते हुए कहा कि यह नियमावली आपसी भाईचारे और सौहार्द को प्रभावित करने वाली थी। केसरिया भारत संस्था के गौरीश सिंह और अधिवक्ता संतोष सिंह ने भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत किया। उनका कहना था कि यह किसी वर्ग विशेष की जीत या हार नहीं, बल्कि समानता और न्याय की जीत है। उन्होंने कहा कि किसी भी नियम को लागू करने से पहले उसके सामाजिक प्रभावों पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।
अखिलेश यादव ने किया फैसले का स्वागत
समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने बृहस्पतिवार को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के नए नियमों पर उच्चतम न्यायालय द्वारा रोक लगाने के फैसले का स्वागत किया और कहा कि सच्चा न्याय यह सुनिश्चित करने में है कि किसी पर भी अत्याचार या अन्याय न हो।
यादव ने 'एक्स' पर पोस्ट किया, ''सच्चा न्याय किसी के साथ अन्याय नहीं होता है, माननीय न्यायालय यही सुनिश्चित करता है। कानून की भाषा भी साफ होनी चाहिए और भाव भी। बात सिर्फ़ नियम नहीं, नीयत की भी होती है।'' उन्होंने कहा, ''न किसी का उत्पीड़न हो, न किसी के साथ अन्याय, न किसी पर जुल्म-ज्यादती हो, न किसी के साथ नाइंसाफ़ी।''
इससे पहले उच्चतम न्यायालय ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के हालिया नियमों के खिलाफ दायर कई याचिकाओं पर बृहस्पतिवार को सुनवाई करते हुए इस पर रोक लगा दी। इन याचिकाओं में दलील दी गई थी कि आयोग ने जाति-आधारित भेदभाव की गैर-समावेशी परिभाषा अपनाई है और कुछ श्रेणियों को संस्थागत संरक्षण से बाहर रखा है।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने विनियमन को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर केंद्र और यूजीसी को नोटिस जारी किए। उच्च शिक्षण संस्थानों में भेदभाव संबंधी शिकायतों की जांच करने और समानता को बढ़ावा देने के लिए सभी संस्थानों द्वारा ''समानता समितियां'' गठित करने को अनिवार्य बनाने संबंधी नए नियम 13 जनवरी को अधिसूचित किए गए थे।
मायावती ने किया फैसले का स्वागत
समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने बृहस्पतिवार को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के जातिगत भेदभाव को रोकने के लिए हाल में अधिसूचित नियमों पर उच्चतम न्यायालय द्वारा रोक लगाने के फैसले का स्वागत किया और कहा कि सच्चा न्याय यह सुनिश्चित करने में है कि किसी पर भी अत्याचार या अन्याय न हो।
बसपा प्रमुख मायावती ने 'एक्स' पर एक पोस्ट में कहा, ''विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने देश के सरकारी व निजी विश्वविद्यालयों मे जातिवादी घटनाओं को रोकने के लिए जो नये नियम लागू किये गये हैं, उनसे सामाजिक तनाव का वातावरण पैदा हो गया है। ऐसे वर्तमान हालात को मद्देनजर रखते हुये माननीय उच्चतम न्यायालय का यूजीसी के नये नियम पर रोक लगाने का आज का फैसला उचित है।''
उन्होंने कहा, ''जबकि देश में, इस मामले में सामाजिक तनाव आदि का वातावरण पैदा ही नहीं होता अगर यूजीसी नये नियम को लागू करने से पहले सभी पक्ष को विश्वास में ले लेती और जांच समिति आदि में भी सवर्ण समुदाय को 'प्राकृतिक न्याय' के अन्तर्गत उचित प्रतिनिधित्व दे देती।''
इससे पहले उच्चतम न्यायालय ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के हालिया नियमों के खिलाफ दायर कई याचिकाओं पर बृहस्पतिवार को सुनवाई करते हुए इस पर रोक लगा दी। इन याचिकाओं में दलील दी गई थी कि आयोग ने जाति-आधारित भेदभाव की गैर-समावेशी परिभाषा अपनाई है और कुछ श्रेणियों को संस्थागत संरक्षण से बाहर रखा है।
