संपादकीय: क्रिकेट पर कलह-24 जनवरी

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Published By Monis Khan
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टी-20 विश्व कप जैसे वैश्विक आयोजन से ठीक पहले बांग्लादेश क्रिकेट बोर्ड द्वारा इसे खेलने से इनकार करना, एक व्यापक राजनीतिक संकेत देता है। अंतरिम सरकार के खेल सलाहकार आसिफ नजरुल और बीसीबी अध्यक्ष अमीनुल इस्लाम ‘बुलबुल’ का यह कहना कि टीम भारत नहीं जाएगी, तब और अधिक प्रश्न खड़े करता है, जब भारत एक स्थिर सरकार, सुदृढ़ सुरक्षा तंत्र और सफलतापूर्वक आयोजित अंतर्राष्ट्रीय आयोजनों का रिकॉर्ड रखता है।

 ऐसे में असुरक्षा का तर्क वस्तुपरक से ज्यादा राजनीतिक है। क्रिकेट प्रेमियों के लिए यह निराशापूर्ण है। भारत-बांग्लादेश या पाकिस्तान-बांग्लादेश जैसे मुकाबलों में जो क्रिकेटीय रोमांच और भावनात्मक तीव्रता होती है, उसे स्कॉटलैंड जैसी टीम से भर पाना मुश्किल है। प्रतिस्पर्धात्मक आकर्षण और दर्शकीय ऊर्जा की दृष्टि से यह एक ‘खानापूरी’ जैसा ही प्रतीत होता है। 

अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में अधिकांश बोर्ड सरकारी प्रभाव से पूरी तरह मुक्त नहीं होते, खिलाड़ियों की खेलने की इच्छा के बावजूद बहुधा सरकारी अनुमति बाधक बनती है, जो खेल की स्वायत्तता पर गंभीर प्रश्न है। आईपीएल में कोलकाता नाइट राइडर्स द्वारा मुस्तफ़ीज़ुर रहमान को रिलीज़ करने का बीसीसीआई का निर्देश विवादित हो सकता है, पर एक फ्रेंचाइज़ी-आधारित, निजी व्यावसायिक लीग में ऐसे निर्देश को समूचे बांग्लादेशी क्रिकेटरों या राष्ट्र के अपमान के रूप में प्रस्तुत करना अतिशयोक्ति है। 

एक खिलाड़ी के अनुबंधीय मसले को राष्ट्रीय अस्मिता का प्रश्न बना देना संतुलित प्रतिक्रिया नहीं कही जा सकती। बांग्लादेश द्वारा आईपीएल के प्रसारण पर रोक लगाना और विश्व कप का बहिष्कार करना दोनों कदम अंततः अपने ही दर्शकों के हितों के विरुद्ध जाते हैं। लगभग दो करोड़ क्रिकेट-प्रेमियों को एक बड़े टी20 आयोजन से वंचित करना किस हद तक न्यायसंगत है? टेस्ट और एकदिवसीय क्रिकेट की घटती लोकप्रियता के बीच टी20 ही वह प्रारूप है, जो युवाओं को जोड़ता है, इसलिए यह कदम खेल-भावना को ठेस पहुंचाने जैसा है। 

आर्थिक दृष्टि से भी यह निर्णय उसे भारी पड़ सकता है। अनुमानतः 27 मिलियन अमेरिकी डॉलर (लगभग 240 करोड़ रुपये) का प्रत्यक्ष नुकसान, साथ ही ब्रॉडकास्ट और स्पॉन्सरशिप राजस्व में गिरावट— ये सब बीसीबी की वित्तीय सेहत पर असर डालेंगे। खिलाड़ी भी मैच फीस और प्रदर्शन-आधारित बोनस से वंचित रहेंगे। दीर्घकाल में यह प्रतिभा विकास और घरेलू ढांचे पर भी असर डाल सकता है। आईसीसी यदि इस कदम को राजनीति प्रेरित मान कर अनुशासनात्मक कार्रवाई करता है, तो सदस्यता निलंबन जैसी कठोर कार्रवाई से अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में बांग्लादेश की भागीदारी ठप पड़ सकती है और द्विपक्षीय श्रृंखलाएं अनिश्चितकाल के लिए टल सकती हैं।

इससे नुकसान केवल भारत या आईसीसी का नहीं, स्वयं बांग्लादेश का अधिक होगा। भारत और बीसीसीआई को भी प्रसारण व दर्शकीय राजस्व में कमी का सामना करना पड़ सकता है। 
सबसे बड़ा सवाल यह कि क्या क्रिकेट को कूटनीति का औजार बनाया जाना चाहिए? इतिहास साक्षी है कि खेल संवाद के पुल बनाते हैं, दीवारें नहीं। बांग्लादेश सरकार और बीसीबी के पास अभी भी संवाद, मध्यस्थता और संतुलित समाधान का मार्ग खुला है।