संपादकीय: संतुलन का समय

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Published By Monis Khan
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डोनाल्ड ट्रंप की राजनीति का सबसे स्थायी तत्व उनकी अस्थायित्व और अनिश्चितता है। कभी 100 प्रतिशत टैरिफ की धमकी, फिर उससे पीछे हटना, कभी ग्रीनलैंड पर कब्जे  का दावा, कभी सैन्य कार्रवाई से इनकार; कभी नाटो से दूरी, तो कभी समझौते की भाषा— यह शैली पारंपरिक कूटनीति से अलग, दबाव-आधारित सौदेबाज़ी की रणनीति प्रतीत होती है। 

ट्रंप की राजनीति को समझने के लिए इसे ‘नीति की अस्थिरता’ नहीं, बल्कि ‘रणनीतिक अनिश्चितता’ के रूप में पढ़ना होगा, जहां अधिकतम लाभ के लिए भ्रम और दबाव दोनों साधन हैं। ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप का तर्क कि यदि अमेरिका नियंत्रण नहीं करेगा तो रूस या चीन प्रभाव बढ़ा लेंगे, भू-रणनीतिक चिंताओं का बहाना है, असल बात आर्कटिक क्षेत्र में पिघलती बर्फ, जो नए समुद्री मार्ग और खनिज संसाधनों के अवसर खोल रही है, उसे कब्जाना है। रूस आर्कटिक में सैन्य उपस्थिति मजबूत कर चुका है, चीन अपने को ‘नियर-आर्कटिक स्टेट’ कहता है, लेकिन इसका बहाना लेकर संप्रभु डेनमार्क का अधिग्रहण कहां से उचित है। अमेरिका को अपनी सुरक्षा चिंताओं का समाधान नाटो के ढांचे, संयुक्त रक्षा सहयोग और आर्थिक साझेदारी के माध्यम से करना होगा, बलपूर्वक कब्ज़े से नहीं। 

अमेरिका जानता है कि डेनमार्क, फ्रांस, कनाडा और अन्य यूरोपीय देशों द्वारा राजनीतिक, कानूनी और सामूहिक सुरक्षा तंत्र के माध्यम से जो प्रतिरोध करेंगे, वह असरकारक होगा। नाटो की सामूहिक रक्षा प्रतिबद्धता भी एक बड़ा अवरोध है। ऐसे में ग्रीनलैंड पर आसानी से कब्ज़ा कठिन है। घरेलू राजनीति के स्तर पर भी यह दांव जोखिमपूर्ण है। यदि ट्रंप पीछे हटते हैं, तो उनके समर्थक इसे कमजोरी मान सकते हैं; यदि आक्रामक कदम उठाते हैं, तो त्वरित अधिग्रहण से ‘अमेरिकी महानता’ का प्रतीकात्मक संदेश तो मिल सकता है, पर अंतर्राष्ट्रीय अलगाव और आर्थिक अस्थिरता राजनीतिक लाभ को नुकसान भी पहुंचा सकती है। 

रूसी मीडिया द्वारा ट्रंप की प्रशंसा और चीनी आलोचना भी रोचक संकेत देती है। रूस को यूरोप-अमेरिका संबंधों में दरार लाभप्रद दिखती है, जबकि चीन किसी भी अमेरिकी क्षेत्रीय विस्तारवादी संकेत से सावधान है। व्यापक संदर्भ में यह अमेरिका, रूस और चीन के बीच नई शक्ति-संतुलन की प्रतिस्पर्धा का हिस्सा है, जहां आर्कटिक, इंडो-पैसिफिक और ऊर्जा मार्ग नई भू-राजनीतिक सीमाएं बन रहे हैं। इसे नई औपनिवेशिक व्यवस्था शायद अतिशयोक्ति हो पर शक्ति-प्रदर्शन की प्रवृत्ति स्पष्ट है। भारत के लिए यह परिदृश्य चुनौती और अवसर दोनों है। 

यदि अमेरिका और यूरोप के बीच तनाव बढ़ता है, तो भारत-यूरोपीय संघ संबंधों में नई गति आ सकती है। प्रस्तावित भारत-ईयू मुक्त व्यापार समझौता दो अरब से अधिक लोगों के बाजार को जोड़ सकता है, जो वैश्विक जीडीपी का लगभग एक-चौथाई होगा। फार्मा, टेक्सटाइल, रत्न-आभूषण, ऑटोमोबाइल, सोलर उपकरण और लेदर जैसे क्षेत्रों को बड़ा लाभ मिल सकता है। अमेरिका पर अत्यधिक निर्भरता कम कर बहुध्रुवीय व्यापार साझेदारियां भारत की सामरिक स्वायत्तता को मजबूत करेंगी। वर्तमान भू-राजनीतिक परिस्थितियों में भारत की नीति स्पष्ट है- रणनीतिक स्वायत्तता, संतुलित बहुपक्षीयता और आर्थिक कूटनीति का विस्तार।