पुलिस एनकाउंटर में फायरिंग ‘सजा’ नहीं, कानून का उल्लंघन है : हाईकोर्ट

Amrit Vichar Network
Published By Deepak Mishra
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प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुलिस एनकाउंटर के नाम पर आरोपियों को गोली मारने की बढ़ती प्रवृत्ति पर कड़े शब्दों में टिप्पणी करते हुए कहा कि आरोपियों को दंडित करने का अधिकार केवल न्यायालय को है, पुलिस को नहीं। आरोपियों को 'सबक सिखाने' के नाम पर गोली चलाना कानून के शासन के खिलाफ है और ऐसा कृत्य पूरी तरह अस्वीकार्य है। 

उक्त आदेश न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल की एकलपीठ ने मिर्जापुर जिले के पुलिस स्टेशन कोतवाली देहात में बीएनएस की विभिन्न धाराओं के तहत राजू उर्फ राजकुमार को सशर्त जमानत देते हुए पारित किया।  मामले में दर्ज प्राथमिकी पर विचार कर कोर्ट ने पाया कि मामला एक कथित पुलिस एनकाउंटर से जुड़ा है, जिसमें आरोपी को गंभीर गोली लगने की चोटें आईं। कोर्ट ने पहले ही राज्य सरकार से यह स्पष्ट करने को कहा था कि क्या एनकाउंटर के संबंध में अलग एफआईआर दर्ज की गई और क्या घायल का बयान मजिस्ट्रेट या मेडिकल अधिकारी के समक्ष दर्ज कराया गया।

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में तय दिशा-निर्देशों का हवाला देते हुए कहा कि पुलिस एनकाउंटर में मृत्यु या गंभीर चोट की स्थिति में तत्काल एफआईआर दर्ज करना, स्वतंत्र और वरिष्ठ अधिकारी द्वारा जांच कराना तथा घायल का बयान दर्ज करना अनिवार्य है। ये निर्देश संविधान के अनुच्छेद 141 के तहत देश का कानून हैं और इनका पालन हर हाल में होना चाहिए, जबकि वर्तमान मामले में सुनवाई के दौरान कोर्ट के समक्ष यह तथ्य आया कि एनकाउंटर के संबंध में अलग एफआईआर तो दर्ज की गई, लेकिन घायल आरोपी का बयान न तो मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज हुआ और न ही किसी मेडिकल अधिकारी द्वारा। 

इसके अलावा जांच प्रारंभ में उस स्तर के अधिकारी से कराई गई, जो सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप नहीं था। सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट दिशा निर्देशों के उल्लंघन पर कोर्ट ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि उसके सामने बार-बार ऐसे मामले आ रहे हैं, जहां छोटे अपराधों में भी पुलिस द्वारा आरोपियों के पैरों में गोली मार दी जाती है, मानो यह एक नियमित प्रक्रिया बन गई हो। 

केवल सराहना, पदोन्नति या सोशल मीडिया में प्रसिद्धि पाने के लिए अनावश्यक फायरिंग लोकतांत्रिक व्यवस्था और कानून के शासन के खिलाफ है। मामले से जुड़े अन्य जमानत प्रकरणों में तो स्थिति और भी गंभीर पाई गई, जहां स्वयं एनकाउंटर का नेतृत्व करने वाले पुलिस अधिकारी ने स्वीकार किया कि उसी की गोली आरोपी को लगी। इसके बावजूद न तो कोई एफआईआर दर्ज की गई और न ही जांच कराई गई।

इन हालातों को गंभीर मानते हुए हाईकोर्ट ने पिछली सुनवाई यानी 28 जनवरी को उत्तर प्रदेश के अपर मुख्य सचिव (गृह) और पुलिस महानिदेशक को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से तलब किया था। दोनों अधिकारियों ने कोर्ट के आदेश के अनुपालन में 30 जनवरी को कोर्ट में उपस्थित होकर बताया कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुपालन के लिए पूर्व में परिपत्र जारी किए गए हैं, लेकिन कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जमीनी स्तर पर इनका पालन नहीं हो रहा। 
अधिकारियों ने भविष्य में सख्ती से अनुपालन सुनिश्चित करने और लापरवाही बरतने वाले पुलिसकर्मियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई का आश्वासन दिया। इस पर कोर्ट ने यह भी चेतावनी दी कि यदि भविष्य में किसी जिले में पुलिस एनकाउंटर से जुड़े मामलों में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का उल्लंघन पाया गया, तो न केवल एनकाउंटर का नेतृत्व करने वाले अधिकारी, बल्कि संबंधित जिले के पुलिस प्रमुख भी अवमानना कार्यवाही के दायरे में आएंगे। 

अतः मामले के तथ्यों, आरोपी की हिरासत अवधि, चार्जशीट दाखिल होने और सुप्रीम कोर्ट के हालिया जमानत संबंधी निर्णयों को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने याची को सशर्त जमानत दे दी, साथ ही राज्य के सभी जिला न्यायाधीशों को आदेश की प्रति भेजने और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग व्यवस्था सुधारने के भी निर्देश दिए गए।

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