संपादकीय: संप्रभुता पर सख्त

Amrit Vichar Network
Published By Monis Khan
On

देश के गृहमंत्री अमित शाह द्वारा यह स्पष्ट कहना कि तथाकथित ‘चिकन नेक’ भारत की भूमि है और इस पर कोई हाथ नहीं लगा सकता, वर्तमान भू-राजनीतिक परिदृश्य में एक गंभीर रणनीतिक संकेत है। बयान बताता है कि केंद्र सरकार 22 किलोमीटर चौड़ी सिलीगुड़ी कॉरिडोर की सुरक्षा को लेकर अत्यंत सतर्क और इसकी रक्षा के लिS आक्रामक रुख रखती है।

‘चिकन नेक’ पूर्वोत्तर भारत को शेष देश से जोड़ने वाली एकमात्र स्थलीय कड़ी है। इसके पश्चिम में नेपाल, पूर्व में बांग्लादेश और उत्तर में भूटान तथा चीन का प्रभाव क्षेत्र है। यदि इस संकरी पट्टी की सुरक्षा में कोई व्यवधान आता है, तो आठ पूर्वोत्तर राज्यों की भौगोलिक और सामरिक निरंतरता पर प्रत्यक्ष असर पड़ सकता है। इस दृष्टि से इसे रणनीतिक संप्रभुता का मामला माना जाना चाहिए। 

गृहमंत्री ने यह भी संकेत दिया कि दिल्ली में कुछ तत्वों ने इस कॉरिडोर को ‘काट देने’ जैसे नारे लगाए थे। उनके बयान पर केंद्र की कड़ी प्रतिक्रिया यह संदेश देती है कि राष्ट्रीय एकता और भौगोलिक अखंडता पर कोई भी सार्वजनिक उकसावा अब सहन नहीं किया जाएगा और राजनीतिक विमर्श की आड़ में सामरिक संवेदनशीलता को हल्के में लेने वालों के साथ सख्त रवैया अपनाया जाएगा। पश्चिम बंगाल में सरकार बनते ही सीमा पर बाड़ लगाने की घोषणा भी इसी व्यापक सुरक्षा दृष्टिकोण का हिस्सा है। 

जहां भूमि संबंधी विवाद हैं, वहां केंद्र और राज्य के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता है, हलांकि केवल भूमि का मुद्दा ही बाधा नहीं है; तकनीकी सर्वेक्षण, सीमा निर्धारण के अंतर्राष्ट्रीय समझौते और स्थानीय विरोध भी प्रक्रिया को धीमा करते हैं। असल में सीमा प्रबंधन में भूमि अधिग्रहण, स्थानीय प्रशासन का सहयोग, पर्यावरणीय स्वीकृतियां तथा अंतर्राष्ट्रीय सीमा प्रोटोकॉल जैसे जटिल पहलू शामिल होते हैं। कई स्थानों पर राज्य सरकारों द्वारा भूमि उपलब्ध कराने में देरी एक व्यावहारिक बाधा रही है, पर यह पूरी कहानी नहीं है। नदियां, आबादी का घनत्व, तस्करी की चुनौतियां और सीमा पर रहने वाले नागरिकों के आजीविका संबंधी प्रश्न भी बाड़बंदी को जटिल बनाते हैं। इसलिए दूसरी सीमाओं, विशेषकर कुछ हिस्सों में भारत-बांग्लादेश और भारत-पाकिस्तान सीमा पर भी पूर्ण बाड़बंदी अभी बाकी है। 

भाजपा पश्चिम बंगाल में सत्ता में नहीं आती तो भी बाड़ तो लगेगी, क्योंकि राष्ट्रीय सुरक्षा किसी एक दल के शासन पर निर्भर नहीं हो सकती। संवैधानिक ढांचे के भीतर केंद्र सरकार के पास सीमा सुरक्षा के पर्याप्त अधिकार हैं। किंतु प्रभावी क्रियान्वयन के लिए राज्य सरकार का सहयोग अनिवार्य होता है। बेहतर समाधान यह होगा कि इसे चुनावी मुद्दा बनाने के बजाय सर्वदलीय सहमति और केंद्र–राज्य समन्वय के जरिए आगे बढ़ाया जाए। गृहमंत्री का बयान केवल चुनावी आरोप-प्रत्यारोप नहीं माना जाना चाहिए। यह उस बदलते सुरक्षा वातावरण की स्वीकृति है, जिसमें हाइब्रिड युद्ध, सूचना युद्ध और आंतरिक अस्थिरता के प्रयास समान रूप से गंभीर खतरे हैं। ‘चिकन नेक’ केवल एक भूगोल नहीं, भारत की पूर्वोत्तर नीति, ‘एक्ट ईस्ट’ रणनीति और सामरिक आत्मविश्वास का प्रतीक है, इसलिए इस मुद्दे को राजनीतिक शोर से ऊपर उठाकर राष्ट्रीय सुरक्षा के ठोस, संस्थागत और दीर्घकालिक दृष्टिकोण से देखना समय की मांग है।